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मोदी आंदोलन की ताकत को भांपने में चूक रहे हैं?

भारतीय राजनीति में जनआंदोलनों का इतिहास हमेशा से सत्ता के समीकरणों को चुनौती देने वाला रहा है। जब-जब सत्ता अपने फैसलों को अटूट और अपरिवर्तनीय मान लेती है, तब-तब सड़क पर उतरी जनता की आवाज ने उसे पुनर्विचार पर मजबूर किया है। हाल के दिनों में उभरा कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध और उसके समर्थन में देश भर में तेजी से फैलता छात्र आंदोलन एक बार फिर इसी सवाल को रेखांकित कर रहा है: क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनभावनाओं की नब्ज और आंदोलनों की जीवटता को समझने में लगातार गलतियां कर रहे हैं?

इससे पहले ऐतहासिक किसान आंदोलन के दौरान भी सरकार का शुरुआती रवैया यही दर्शा रहा था कि विरोध का यह दौर कुछ ही समय में अपने आप शांत हो जाएगा। हालांकि, दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक डटे किसानों के दृढ़ संकल्प ने यह साबित कर दिया कि सत्ता का पाला किस किस्म के जीवट और संघर्षशील लोगों से पड़ा है। अब कॉकरोच जनता पार्टी के मुद्दे और उससे जुड़े जनाक्रोश को लेकर भी राजनीति के गलियारों में यही चर्चा गर्म है कि सरकार जन-असंतोष की वास्तविक तीव्रता को समय रहते भांप नहीं सकी। इस राजनीतिक चूक के कारणों को समझने के लिए विश्लेषक कई कोणों पर बात करते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि श्री मोदी का प्राथमिक राजनीतिक अनुभव गुजरात के प्रादेशिक शासन ढांचे से आकार लेता है। गुजरात में दशकों तक राजनीतिक परिदृश्य काफी हद तक स्थिर और पार्टी के नियंत्रण में रहा, जहाँ इस प्रकार के लंबे, असंगठित और सघन जनआंदोलनों की गंभीर चुनौतियाँ आमतौर पर देखने को नहीं मिलीं।

राज्य स्तर पर प्रशासनिक कड़ाई और संगठनात्मक नियंत्रण से जिस तरह विरोधों को संभाल लिया जाता था, राष्ट्रीय स्तर पर वह मॉडल हर बार कारगर साबित नहीं होता। भारत का राष्ट्रीय परिदृश्य विविधताओं, क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं और अलग-अलग वर्गों के संघर्षों से भरा हुआ है। जब उत्तर भारत का किसान, दक्षिण का श्रमिक या देश भर का युवा एक साथ किसी नीतिगत फैसले के खिलाफ खड़ा होता है, तो वहाँ केवल प्रशासनिक नियंत्रण काम नहीं आता।

गुजरात के राजनीतिक मॉडल में इस तरह के विशाल और विविधतापूर्ण जनआंदोलनों से सीधे निपटने के अनुभव की कमी कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्तर पर फैसलों के आकलन में आड़े आती दिखती है। किसी भी मजबूत लोकतंत्र और राजनीतिक दल के लिए आंतरिक नेतृत्व की विविधता बेहद जरूरी होती है। हालांकि, मौजूदा दौर में भारतीय जनता पार्टी के भीतर सत्ता और निर्णय प्रक्रिया का अति-केंद्रीकरण एक बड़ा विषय बन चुका है।

पार्टी के भीतर दूसरे और तीसरे स्तर के क्षत्रपों या प्रादेशिक नेताओं को उस तरह से उभरने का मौका नहीं मिल रहा है, जैसा कि पहले के दौर में देखा जाता था। जब सारे फैसले केवल शीर्ष स्तर पर लिए जाते हैं और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं व नेताओं की प्रतिक्रियाओं को किनारे कर दिया जाता है, तो संगठन के भीतर एक प्रकार की राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हो जाती है। प्रादेशिक नेता जनता के बीच व्याप्त नाराजगी को शीर्ष नेतृत्व तक सीधे और बेबाक तरीके से पहुँचाने से झिझकते हैं। परिणामस्वरुप, शीर्ष नेतृत्व तक केवल ‘सब ठीक है’ वाली खबरें पहुँचती हैं और जनता के बीच सुलग रही असंतोष की आग का सही अंदाजा समय रहते नहीं हो पाता।

कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान के साथ ही जिस तरह देश के विभिन्न हिस्सों से छात्रों और युवाओं की आवाज़ें जुड़ने लगी हैं, उसने इस पूरे घटनाक्रम को एक नया और गंभीर मोड़ दे दिया है। भारत में छात्र आंदोलन का एक स्वर्णिम और परिवर्तनकारी इतिहास रहा है—चाहे वह 1970 के दशक का जेपी आंदोलन हो या फिर विभिन्न दौर के रोजगार व शिक्षा संबंधी विरोध।

आज जब छात्र आंदोलन विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से निकलकर सड़कों पर फैल रहा है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि मुद्दा केवल किसी एक पार्टी या नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह युवाओं के भविष्य और उनकी चिंताओं से जुड़ चुका है। देश भर से आ रही छात्र विरोध की सूचनाएं यह चेतावनी दे रही हैं कि यदि समय रहते संवाद के रास्ते नहीं खोले गए, तो यह स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।

सत्ता में लंबे समय तक रहने का एक बड़ा जोखिम यह होता है कि शासक वर्ग जनता के वास्तविक मूड से कटने लगता है। किसान आंदोलन से लेकर वर्तमान में कॉकरोच जनता पार्टी और छात्र आंदोलन के इस उभार तक, लगातार मिलती चेतावनियां यही इशारा करती हैं कि सरकार को अपनी निर्णय शैली और जन-संवाद के तरीकों में सुधार करने की आवश्यकता है। जनआंदोलनों को केवल राजनीतिक चुनौती मानने के बजाय यदि उनकी जीवटता और जनता के दर्द को समझा जाए, तभी किसी स्थायी और लोकतांत्रिक समाधान तक पहुँचा जा सकता है।