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जंतर मंतर पर पुलिस की बर्बरता का मामला हाईकोर्ट पहुंचा

केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया गया

  • सरकार की दलील थी पब्लिसिटी के लिए

  • अदालत ने इस दलील पर आपत्ति जतायी

  • मामले के सभी साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएंगे

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः संसद की ओर मार्च कर रहे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग किए जाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इस घटना ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की पीठ ने दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। साथ ही, अदालत ने घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य सभी वीडियो रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के आदेश दिए हैं।

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों और दिल्ली पुलिस व केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. राजू के बीच तीखी बहस देखने को मिली। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि महिला प्रदर्शनकारियों से छेड़छाड़ की गई और उनके गुप्तांगों पर हमला किया गया। पुलिस ने कीलों वाली लाठियों का इस्तेमाल किया और कई पुलिसकर्मियों की वर्दी पर उनके नाम का बैज तक नहीं था। वकीलों ने कहा कि उनके पास इन दावों को साबित करने के लिए 110 वीडियो मौजूद हैं।

इसके जवाब में राजू ने तर्क दिया कि भीड़ उग्र थी और कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह याचिका केवल सुर्खियां बटोरने और पब्लिसिटी पाने के उद्देश्य से दाखिल की गई है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार के इस दावे पर कड़ा ऐतराज जताते हुए सवाल किया, आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह पब्लिसिटी पाने के लिए दाखिल की गई याचिका है? ऐसा कौन करेगा?

सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन और विकास सिंह ने कहा कि प्रदर्शनकारी संविधान द्वारा प्रदत्त शांतिपूर्ण विरोध और सभा के अधिकार का पालन कर रहे थे। हरिहरन ने पीठ को बताया, इसके बाद जो हुआ वह अकल्पनीय था। संभव सीमा से अधिक बर्बरता का प्रयोग किया गया। मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा कि राज्य के पास आंदोलन को नियंत्रित या व्यवस्थित करने की शक्ति नहीं है… लेकिन पुलिसकर्मियों को महिलाओं के गुप्तांगों पर वार करते देखा जा सकता है। विरोध प्रदर्शन के दौरान महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई। 90 से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

वहीं, एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से अवैध रूप से हटाए जाने का आरोप लगाने वाले याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि सोमवार को मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे गए। उन्होंने 2012 के बाबा रामदेव के धरना-प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि आंसू गैस का इस्तेमाल केवल अंतिम विकल्प होना चाहिए।

शंकरनारायणन ने अदालत के सामने दावा किया कि माँ और बच्चों पर आंसू गैस के गोले फेंके जाने के वीडियो मौजूद हैं।पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई लाठियों में कीलें लगी हुई थीं। कई पुलिसकर्मी बिना वर्दी के टी-शर्ट और जींस में थे। एक वीडियो में पुलिसकर्मी भागते हुए प्रदर्शनकारी को टांग मारकर गिराते हैं और फिर चार लोग मिलकर उस पर हमला कर देते हैं। दिल्ली पुलिस सिविल ड्रेस में युवा छात्रों को डराती-धमकाती और उन पर हमला करती दिख रही है। एक अन्य वीडियो में प्रदर्शन स्थल के पास पत्थरों से भरी गाड़ी खड़ी दिखाई दे रही है, जिसे प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही वहां पार्क कर दिया गया था ताकि सारा दोष प्रदर्शनकारियों पर मढ़ा जा सके।

एएसजी एस. राजू ने इन तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता सोशल मीडिया पर मौजूद असत्यापित वीडियो पर भरोसा कर रहे हैं, जबकि ऐसे कई वीडियो हैं जो दर्शाते हैं कि पुलिसकर्मी भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

उन्होंने तर्क दिया कि अज्ञात लोगों को पुलिसकर्मी बताकर आरोप लगाए जा रहे हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का अक्सर राजनीतिक लाभ उठाने के लिए असामाजिक तत्वों द्वारा अपहरण (हायजैक) कर लिया जाता है। एएसजी ने कहा कि प्रदर्शनकारी पत्थरबाजी में शामिल थे और पत्थरों से भरी गाड़ी का वहां होना यही साबित करता है कि भीड़ उग्र थी, जिससे बचने के लिए अब याचिकाकर्ता पुलिस पर मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं।