असम के मजदूर अमीनूल हक पर उच्च न्यायालय का फैसला
भूपेन गोस्वामी
गुवाहाटी: असम के एक व्यक्ति ने खुद को विदेशी घोषित करने वाले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (विदेशी न्यायाधिकरण) के आदेश को गुवाहाटी उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसने भारतीय नागरिकता के अपने दावे के समर्थन में 15 दस्तावेज पेश किए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि वह कानूनी रूप से अपनी नागरिकता स्थापित करने में विफल रहा।
फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल नंबर 4, कामरूप (मेट्रोपॉलिटन), गुवाहाटी ने 28 फरवरी, 2019 को दैनिक वेतन भोगी मजदूर अमीनुल हक को विदेशी घोषित किया था। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका दायर कर इस आदेश को चुनौती दी।
अपने दावे के समर्थन में, हक ने 15 दस्तावेज पेश किए, जिनमें उनका पैन कार्ड, मतदाता सूची, मतदाता पहचान पत्र, 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की एक कंप्यूटर-जनरेटेड कॉपी (जिसमें उनके पिता और दादा-दादी के नाम थे), और 1973 में खरीदी गई जमीन के एक प्लॉट की मूल बिक्री विलेख (सेल डीड) शामिल थी।
हालांकि, न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति शमीमा जहां की खंडपीठ ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया था, वे या तो साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं थे या उनकी नागरिकता साबित करने के लिए अपर्याप्त थे।
अदालत ने 30 जून के अपने फैसले में कहा, हालांकि याचिकाकर्ता ने प्रदर्श के रूप में 15 दस्तावेज पेश किए थे, लेकिन ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि इनसे उन्हें यह स्थापित करने में मदद मिली कि वह विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत अपनी नागरिकता साबित करने के दायित्व को पूरा करने में सक्षम रहे हैं।
याचिकाकर्ता के पिता ने ट्रिब्यूनल के सामने हक को अपना बेटा बताया था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि विदेशी अधिनियम के तहत कार्यवाही में केवल एक लिखित बयान और मौखिक गवाही पर्याप्त नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की, विचाराधीन तथ्य को याचिकाकर्ता द्वारा ऐसे दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करके साबित करना होगा जो स्वीकार्य और प्रासंगिक हों।
एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने नोट किया कि एनआरसी उद्धरण (एक्सट्रैक्ट) पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता जब तक कि वह कानून की आवश्यकताओं को पूरा न करता हो। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत 1951 का एनआरसी उद्धरण केवल एक कंप्यूटर-जनरेटेड प्रिंटआउट था और उसमें भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65B के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र नहीं था।
अदालत ने यह भी नोट किया कि ट्रिब्यूनल ने याचिकाकर्ता के कथित दादा के नाम पर प्रस्तुत 1973 के भूमि बिक्री विलेख को खारिज कर दिया था, क्योंकि संपत्ति की वर्तमान स्थिति या यह दादा के कानूनी वारिसों के पास क्यों नहीं गई, इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं था।
यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता ट्रिब्यूनल द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन में कोई स्पष्ट त्रुटि दिखाने में विफल रहा, उच्च न्यायालय को इसके फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला। फैसले में कहा गया, …अदालत को यह मानने के लिए कोई सामग्री नहीं मिली कि इस रिट याचिका में चुनौती दिया गया फैसला तथ्यों या कानून के मामले में गलत है। याचिकाकर्ता यह नहीं दिखा सका कि उक्त राय किसी भी स्तर पर विकृत थी। इसलिए, यह चुनौती विफल हो जाती है और परिणामस्वरूप, यह रिट याचिका खारिज की जाती है।