हाईकोर्ट के जज के सवाल से भाजपा के तेवर उल्टे पड़े
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सरकारी आदेश को ही रद्द कर दिया
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नारों से इसका आधार नहीं बन सकता
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पुलिस दरअसल जनता के सेवक है
राष्ट्रीय खबर
मुंबईः बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के प्रदेश महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की तड़ीपारी (शहर निकाला) के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने को इस तरह की कार्रवाई का आधार कैसे बनाया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस माधव जामदार ने लोकसभा के पूर्व उम्मीदवार चौधरी को मुंबई और उसके आस-पास के इलाकों से एक साल के लिए तड़ीपार करने के मुंबई पुलिस के फैसले पर कड़े सवाल उठाए। जज ने विशेष रूप से पूछा कि भाजपा सरकार मुर्दाबाद और अमित शाह मुर्दाबाद जैसे नारों को तड़ीपारी का आधार क्यों माना गया।
जस्टिस जामदार ने सरकार से पूछा, इस तरह के नारे तड़ीपारी का आधार कैसे बन सकते हैं?
अदालत उस आदेश की समीक्षा कर रही थी जिसने चौधरी के एक साल तक शहर और पड़ोसी इलाकों में प्रवेश पर रोक लगा दी थी। एकल न्यायाधीश की पीठ ने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक असहमति को ऐसे उपायों से नहीं दबाया जा सकता और चौधरी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए पुलिस की आलोचना की।
जस्टिस जामदार ने टिप्पणी की, नागरिकों को केंद्र सरकार का गुलाम नहीं बनाया जा सकता। पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है, वे लोक सेवक हैं। हाई कोर्ट ने आगे सवाल किया, क्या ये मामले उनके खिलाफ इसलिए दर्ज किए गए हैं क्योंकि वह किसी दूसरी पार्टी से हैं? उन्हें भी पाला बदलने दीजिए और ऐसे सभी मामले खत्म हो जाएंगे। पूरे देश में हॉर्स-ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) हो रही है।
उन्होंने देश भर में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों से इसकी तुलना की। नीट पेपर लीक जैसे मुद्दों पर प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए पीठ ने पूछा, क्या आप उनके खिलाफ भी ऐसे आदेश पारित करेंगे? जस्टिस जामदार ने तंज कसते हुए कहा कि याचिकाकर्ता सरकार की वॉशिंग मशीन के जरिए अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को साफ करने के लिए बस राजनीतिक पाला बदल सकते हैं। आदेश को रद्द करते हुए अदालत ने माना कि चौधरी के खिलाफ की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन थी। अदालत ने कहा, अनुच्छेद 14 और 21 के अनुसार, नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है, बल्कि सम्मान के साथ जीने का भी अधिकार है।