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भारत के जमीनी लोकतंत्र का क्षरण

ग्रामीण विकास मंत्रालय के सर्वेक्षणों पर आधारित एक नई रिपोर्ट, भारत के जमीनी स्तर के लोकतंत्र (पंचायती राज) के क्षरण को समझने के लिए एक दुर्लभ और डेटा-समर्थित अवसर प्रदान करती है। हालांकि, जहां सरकार ने इस मुद्दे को केवल ग्राम सभाओं की जीवंतता की कमी के रूप में पेश किया है, वहीं यह रिपोर्ट एक विरोधाभास को उजागर करती है।

यह इस बात को स्वीकार करती है कि भागीदारी की थकान के कारण नागरिक ग्राम सभाओं में भाग लेने से कतरा रहे हैं, लेकिन इसके समाधान के रूप में अधिक बैठकें आयोजित करने और अत्यधिक निगरानी रखने जैसे जो सुझाव दिए गए हैं, वे ग्रामीण श्रमिक वर्ग को व्यवस्था से और अधिक अलग-थलग करने का नुस्खा मात्र हैं। संविधान का 73वां संशोधन ग्राम सभाओं को सशक्त बनाता है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने उन्हें केवल अपनी योजनाओं को मंजूरी देने वाले केंद्रों के रूप में सीमित कर दिया है।

इस बुनियादी दृष्टिकोण में बदलाव होना अत्यंत आवश्यक है। दरअसल ऐसा इसलिए भी हुआ है क्योंकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी नौकरशाही अपने निजी फायदे के लिए ग्राम सभा को सशक्त बनाना ही नहीं चाहती है। रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि 18 फीसद से 28 फीसद उत्तरदाताओं ने ग्राम सभाओं में कम रुचि का कारण सार्थक परिणामों की कमी को बताया है। इसके जवाब में रिपोर्ट निर्णय ऐप के अधिक उपयोग और बैठकों की कार्यवाही (मिनट्स) को वास्तविक समय (रियल-टाइम) में अपलोड करने पर जोर देती है।

वास्तविक दुनिया में, इसके विपरीत प्रभाव दिख रहे हैं; पंचायत सचिवों के पास आम लोगों के साथ चर्चा को सुविधाजनक बनाने के लिए समय कम बचता है, जबकि कमजोर और उदासीन निगरानी के कारण अधिकारियों को श्रमिकों से यह कहने का मौका मिल गया है कि सर्वर त्रुटियों के कारण उनकी मनरेगा की मांगें सिस्टम में दर्ज नहीं हो सकीं। इसी तरह, ग्राम सभाओं में भाग न ले पाने की आधी से अधिक बाधाएं आजीविका से जुड़ी हुई हैं।

यह स्थिति वर्तमान में ग्रामीण श्रम की अनिश्चित प्रकृति जैसे स्पष्ट प्रणालीगत मुद्दों की ओर इशारा करती है, और साथ ही राज्य द्वारा जानबूझकर किए जा रहे आर्थिक बहिष्कार को भी दर्शाती है, जैसा कि कई विद्वानों ने रेखांकित किया है। परंतु यह रिपोर्ट इन विभिन्न और गंभीर संभावनाओं को स्वीकार नहीं करती है। चूंकि सरकार सामाजिक सुरक्षा के एक हिस्से के रूप में ग्राम सभा में उपस्थिति को सवैतनिक बनाने में पूरी तरह विफल रही है, इसलिए ग्राम सभाएं आज भी जमींदारों और ठेकेदारों जैसे सुविधा संपन्न और फुर्सत वाले संभ्रांत वर्ग का खेल का मैदान बनकर रह गई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, ग्राम सभाएं स्थानीय मुद्दों की पहचान करने में अपना 13 फीसद समय खर्च करती हैं, लेकिन राजस्व जुटाने पर चर्चा करने में केवल 4 फीसद समय ही देती हैं। वास्तविकता यह है कि ग्राम पंचायतों को योजनाबद्ध तरीके से अपने स्वयं के कर बढ़ाने से रोका गया है, जिससे वे पूरी तरह से सरकारी अनुदानों पर निर्भर हो गई हैं। 14वें और 15वें वित्त आयोग के अनुदानों ने पंचायत के खर्चों को केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं, जैसे कि पेयजल और स्वच्छता से जोड़ दिया है।

इसके कारण स्थानीय प्राथमिकताओं को केवल जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत जैसे बड़े (फ्लैगशिप) कार्यक्रमों तक ही सीमित कर दिया गया है। ऐसे में यदि धन का आवंटन दिल्ली में बैठे नौकरशाहों द्वारा पहले से ही तय किया जा रहा हो, तो आम नागरिकों के पास इन बैठकों में शामिल होने का कोई ठोस कारण या प्रोत्साहन नहीं बचता। इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट का दावा है कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मजबूत भौतिक बुनियादी ढांचा मौजूद है।

पेसा अधिनियम 1996 और संबंधित वन अधिकार कानूनों के तहत, ग्राम सभाओं को भूमि अधिग्रहण और खनन के लिए अग्रिम सूचित सहमति देने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। इसके बावजूद, सरकारें अक्सर इन ग्राम सभाओं की अनदेखी करती हैं या फिर बैठकों में कम भागीदारी का बहाना बनाकर अपनी मर्जी की सहमति तैयार कर लेती हैं।

छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य विरोध प्रदर्शन इसी बुनियादी मुद्दे से उपजा था। आदिवासियों और ग्रामीणों के पास किसी परियोजना को ना कहने का पूरा अधिकार है और सरकार को बस इसे ईमानदारी से स्वीकार करने की आवश्यकता है। यदि सरकार के लिए केवल हां ही एकमात्र स्वीकार्य उत्तर है, तो इस रिपोर्ट में भागीदारी कम होने की शिकायतें करना महज एक ढोंग या प्रहसन है। ग्रामीण शासन को मजबूत किये बिना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता लेकिन इस सच्चाई को जानने के बाद भी अफसरशाही अपने कमिशन के चक्कर में इसे मजबूत बनने से रोक रही है। दूसरी तरफ ग्रामीण स्तर के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी लालच देकर अपने गुट में शामिल करने का खेल बदस्तूर जारी है।