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लोगों को भ्रम हो गया था कि यहां भी बादल फट गया है

कोलकाता में मूसलाधार बारिश का तांडव

  • जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा

  • अनेक स्थानों पर जल जमाव से परेशानी

  • केदारनाथ हादसे के बाद भय का माहौल

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः एक घंटे की जोरदार बारिश ने इस चर्चा को यहां बल दे दिया कि यहां भी बादल फटने की घटना हुई है। इस भीषण बारिश की वजह से शहर के अनेक इलाके जलमग्न हो गये हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में जैसे-जैसे मानसून की सक्रियता बढ़ रही है, वैसे-वैसे अति-भारी वर्षा और उससे जुड़ी आपदाओं का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

विशेष रूप से पश्चिमी घाट, हिमालय की तलहटी और पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में यह जोखिम सबसे अधिक है। मानसून के दौरान अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से भारी मात्रा में जलवाष्प स्थलखंडों में प्रवेश करती है, जो कभी-कभी क्लाउडबर्स्ट यानी मेघ-विस्फोट जैसी विनाशकारी मौसमी घटनाओं को जन्म देती है।

2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद से क्लाउडबर्स्ट शब्द आम लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन गया है। पहले यह धारणा थी कि यह केवल पहाड़ी इलाकों तक सीमित घटना है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अनियंत्रित शहरीकरण ने इस समीकरण को बदल दिया है। अब कोलकाता जैसे समतल और तटीय शहरों में भी इस तरह की घटनाओं का रुझान बढ़ रहा है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में एक घंटे के भीतर 100 मिलीमीटर या उससे अधिक वर्षा दर्ज की जाती है, तो उसे क्लाउडबर्स्ट माना जाता है। यह बारिश आमतौर पर 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के छोटे दायरे तक सीमित रहती है। कोलकाता जैसे महानगर की जल निकासी क्षमता को देखें, तो यह एक घंटे में औसतन 12 से 18 मिलीमीटर बारिश ही झेल सकती है।

ऐसे में यदि एक घंटे में 100 मिलीमीटर बारिश हो जाए, तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती है, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। पहले यह घटना केवल ढलानों पर देखी जाती थी क्योंकि वहाँ नम हवाएं तेजी से ऊपर उठकर अचानक घनघोर वर्षा करती हैं, लेकिन अब प्रदूषण के कारण बड़े शहरों में सुपरसेल बन रहे हैं जो कम समय में भारी बारिश करने में सक्षम हैं।

क्लाउडबर्स्ट का मुख्य कारण क्युमुलोनिम्बस बादल हैं, जो भारी मात्रा में जलवाष्प और गर्म हवा के तेजी से ऊपर उठने से बनते हैं। कोलकाता में यह घटना अब भी दुर्लभ है, लेकिन हालिया वर्षों में इसके संकेत मिले हैं। यह केवल मानसून तक सीमित नहीं है; चक्रवात या कालवैशाखी के दौरान भी ऐसा हो सकता है। फिलहाल, 1-2 दिन पहले इनकी सटीक भविष्यवाणी करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ये बहुत कम समय और छोटे दायरे में घटते हैं। हालांकि, एआई और रडार तकनीक भविष्य में सुधार की उम्मीद जगाती है। प्रदूषण इन बादलों को अधिक समय तक जलवाष्प संजोने में मदद करता है, जिससे अंततः विस्फोट जैसी स्थिति बनती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि प्रकृति के प्रति लापरवाही से भविष्य में माइक्रोबर्स्ट जैसी आपदाएं भी बढ़ सकती हैं, जिसमें तेज हवाओं के साथ कम समय में 60 मिमी से अधिक बारिश होती है।