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जो खुली आंखों से दिखता है वह राज्यसभा चुनाव में सच नहीं होता

कई बार इधर का वोट उधर का रिकार्ड है झारखंड में

  • गेट के अंदर भी हो जाता है खेल

  • पहले कई बार ऐसा हो भी चुका

  • अचानक निष्ठा बदली है कई की

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में 18 जून 2026 को होने वाले आगामी राज्यसभा चुनाव राज्य की राजनीति में एक बार फिर हलचल पैदा कर रहे हैं। विधानसभा की वर्तमान दलीय स्थिति और 81 विधायकों के सदन में जीत के लिए आवश्यक 28 मतों के जादुई आंकड़े को देखते हुए, यह चुनाव संख्या बल की तुलना में राजनीतिक शतरंज की बिसात अधिक लग रहा है। जहां एक ओर इंडिया गठबंधन के पास अपने दोनों उम्मीदवारों को जिताने के लिए स्पष्ट बहुमत है, वहीं एनडीए द्वारा उम्मीदवार उतारने की संभावना ने क्रॉस वोटिंग की पुरानी और विवादास्पद यादों को ताजा कर दिया है।

झारखंड का राज्यसभा चुनावी इतिहास हॉर्स ट्रेडिंग और निष्ठा बदलने की घटनाओं से भरा रहा है। 2016 का चुनाव इस संदर्भ में सबसे चर्चित रहा है, जब क्रॉस वोटिंग के गंभीर आरोपों और वोट के बदले नोट जैसे मामलों ने चुनाव आयोग को कड़ी निगरानी रखने पर मजबूर कर दिया था। विधानसभा में कई बार देखा गया है कि विधायक दलगत व्हिप का उल्लंघन करते हुए विपक्ष के पाले में वोट डालते हैं। ये घटनाएं न केवल राजनीतिक नैतिकता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि चुनाव आयोग को ओपन बैलट सिस्टम के बावजूद राज्य में सुरक्षा और सतर्कता बढ़ाने के लिए विवश करती रही हैं।

मौजूदा स्थिति में एनडीए के पास अपने दम पर सीट निकालने के लिए आवश्यक मतों का अभाव है, जिसके कारण भाजपा की रणनीतिक चालों पर सबकी नजरें टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एनडीए चुनाव मैदान में उतरता है, तो उसका पूरा दारोमदार गठबंधन के असंतुष्ट विधायकों या अन्य छोटे दलों पर होगा। यही वह बिंदु है जहां क्रॉस वोटिंग की आशंकाएं सबसे अधिक प्रबल हो जाती हैं।

संक्षेप में, झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर एकजुटता की परीक्षा भी है। सत्तारूढ़ दल अपनी संख्या को सुरक्षित रखने के लिए जहां चौकस है, वहीं विपक्ष का दांव इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस हद तक सत्ता पक्ष में सेंधमारी कर पाते हैं। आने वाले दिन न केवल उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे, बल्कि राज्य की राजनीति में वफादारी और दलबदल के नए अध्याय भी लिखेंगे।