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जाति और जनजाति जन्म नहीं जीवनशैली का विषय

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नई बहस प्रारंभ

  • जनगणना के बीच इसकी चर्चा जारी

  • धर्म परिवर्तन पर पहले का फैसला था

  • एसटी मामले में यह नियम लागू नहीं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः मार्च 2026 में चिंतादा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश के अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति समुदायों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानूनी निर्णयों में से एक है, खासकर तब जब देशव्यापी जनगणना प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

धर्म परिवर्तन और जनजातीय पहचान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में व्यवस्था दी है कि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर कोई अन्य धर्म अपनाने पर अपना एससी का दर्जा खो देता है। वहीं, अनुसूचित जनजाति के मामले में केवल धर्म परिवर्तन दर्जा खोने का आधार नहीं हो सकता। हालांकि, यदि कोई एसटी व्यक्ति अपनी जनजातीय प्रथाओं को पूरी तरह छोड़ देता है, तो उसका जनजातीय दर्जा और उसके तहत मिलने वाले सभी वैधानिक लाभ समाप्त हो जाएंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन या जीवनशैली में बदलाव के कारण यदि जनजातीय तौर-तरीकों और सामुदायिक मान्यता से पूरी तरह अलगाव हो जाता है, तो एसटी दर्जे का मूल आधार ही खत्म हो जाता है।

प्रथागत कानून और आदिवासी महिलाओं के अधिकार भारत में आदिवासियों को आधिकारिक तौर पर मुख्य हिंदू व्यक्तिगत कानूनों (जैसे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम) से छूट प्राप्त है और वे अपनी पारंपरिक प्रथाओं द्वारा शासित होते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि कुछ आदिवासी समुदायों की वर्तमान प्रथाएं महिलाओं के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 (समानता और जीवन के अधिकार) का उल्लंघन करती हैं।

2025 के तीरथ कुमार और 2022 के कमला नेती मामले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि वह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों को दी गई छूट (धारा 2(2)) को समाप्त करे, ताकि आदिवासी महिलाओं को भी संपत्ति में समान अधिकार मिल सके। अदालत ने टिप्पणी की थी कि जब गैर-आदिवासी समुदाय की बेटी पिता की संपत्ति में समान हिस्से की हकदार है, तो आदिवासी परिवार की बेटी को इससे वंचित करने का कोई औचित्य नहीं है।

यह मुद्दा छत्तीसगढ़-झारखंड-ओडिशा बेल्ट में होने वाले धर्मांतरण (विशेषकर ईसाई और मुस्लिम धर्म में) के संदर्भ में गहरे राजनीतिक मायने रखता है। भारत में 8.4 करोड़ एसटी आबादी (2011 जनगणना) में से लगभग 79 लाख खुद को अन्य धर्मों का मानते हैं। चिंतादा आनंद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस धर्मांतरण के मुद्दे को कानूनी रूप से संबोधित करने का एक नया रास्ता खोल दिया है। न्यायपालिका का मत है कि उत्तराधिकार अधिकारों के लिए एसटी को कानूनी रूप से हिंदू माना जाना महिलाओं के हित में है। यदि सरकार एसटी को उत्तराधिकार के लिए हिंदुओं के व्यापक दायरे में लाती है, तो गैर-हिंदू धर्मों का पालन करने वाले आदिवासियों के भविष्य और उनके एसटी दर्जे पर बड़े सवाल खड़े हो जाएंगे। यदि सरकार आवश्यक संशोधन नहीं लाती है, तो यह पूरी संभावना है कि न्यायपालिका खुद आदिवासी महिलाओं के लाभ के लिए इस कानूनी छूट को रद्द कर दे।