दिल्ली में मैराथन बैठक के बाद भी औपचारिक एलान नहीं
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गुरुवार की बैठक पर है सभी की नजर
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राज्य में ओबीसी का चेहरा है सिद्धारमैया
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डीके शिवकुमार गुट ढाई साल पर अड़ा है
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः कर्नाटक में सामने आ रही यह हाई-स्टेक राजनीतिक स्थिति कांग्रेस के एक क्लासिक संतुलन तंत्र को दर्शाती है, जहां वह एक तरफ अपनी व्यापक राष्ट्रीय रणनीति को क्रियान्वित कर रही है और दूसरी तरफ आंतरिक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता को भी संभाल रही है। परदे के पीछे चल रही इस बातचीत के मुख्य रूप से दो प्रमुख पहलू हैं। एक मजबूत ओबीसी चेहरे की तलाश
कांग्रेस आलाकमान द्वारा 77 वर्षीय अनुभवी नेता सिद्धारमैया को राज्यसभा के रास्ते दिल्ली स्थानांतरित करने का प्रस्ताव एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है। इस बदलाव को राष्ट्रीय राजनीति में पदोन्नति (प्रमोशन) के रूप में पेश करके पार्टी एक शक्तिशाली क्षेत्रीय क्षत्रप को जबरन बाहर निकालने की खराब छवि से बचना चाहती है। राहुल गांधी द्वारा सामाजिक न्याय और देशव्यापी जाति जनगणना पर ध्यान केंद्रित करने के बीच, सिद्धारमैया का कद एक अग्रणी ओबीसी नेता के रूप में केंद्रीय नेतृत्व के लिए बेहद मूल्यवान बन जाता है। आलाकमान चाहता है कि वे आगामी आम चुनावों से पहले राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी लामबंदी का नेतृत्व संभालें।
यह बदलाव प्रभावी रूप से उस लंबे समय से सुलग रहे सत्ता-साझाकरण के तनाव को संबोधित करता है जो 2023 में राज्य की सत्ता में पार्टी की वापसी के बाद से बना हुआ है। उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार और उनके वफादार लगातार यह दावा करते रहे हैं कि सरकार गठन के समय एक रोटेशनल मुख्यमंत्री (बारी-बारी से सीएम बनने) के समझौते पर सहमति बनी थी। शिवकुमार के खेमे का मानना है कि अब शीर्ष पद संभालने का उनका समय आ गया है।
सिद्धारमैया ने आलाकमान के इस प्रस्ताव को तुरंत हरी झंडी नहीं दी। वे बेंगलुरु लौटे और अपने भरोसेमंद कैबिनेट मंत्रियों और वफादार विधायकों के साथ बैठकें कीं। उनका खेमा उनके अहिंदा (अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों का राजनीतिक गठबंधन) वोट बैंक को लेकर बेहद सुरक्षात्मक है, जो उन्हें राजनीति में जबरदस्त ताकत देता है।
भले ही दिल्ली में कांग्रेस नेता इस नेतृत्व परिवर्तन को महज अटकलें बताकर खारिज कर रहे हैं, लेकिन बेंगलुरु की जमीनी हकीकत एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। गुरुवार सुबह अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ सिद्धारमैया की निर्धारित बैठक को वह मंच माना जा रहा है जहां वे अपने मंत्रियों को अपने अंतिम फैसले की जानकारी देंगे। एआईसीसी महासचिव और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला का बेंगलुरु आगमन संभावित असंतोष को प्रबंधित करने और सिद्धारमैया के वफादार विधायकों में किसी भी खुले विद्रोह को रोकने के लिए बिल्कुल सही समय पर हो रहा है। राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 8 जून बहुत करीब है। ऐसे में पार्टी के पास इस बदलाव को औपचारिक रूप देने और गुटीय मतभेदों को दूर करने के लिए बहुत कम समय बचा है।