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डीलिस्टिंग पर दिल्ली में आदिवासियों का प्रदर्शन होगा

पहली बार गुजरात से उठ गयी आदिवासी आंदोलन की आवाज

  • लाल किला मैदान में जुटेंगे आदिवासी

  • गुजरात से छह हजार कार्यकर्ता रवाना

  • धर्मांतरण से जुड़ा हुआ है यह विषय

राष्ट्रीय खबर

अहमदाबादः डीलिस्टिंग बिल को पारित करने की मांग को लेकर देश भर से लाखों आदिवासियों का जमावड़ा दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में होने जा रहा है। जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले आयोजित इस महारैली का उद्देश्य संसद में लंबे समय से लंबित इस विवादास्पद विधेयक को पारित कराना है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस महाजुटान ने आदिवासी पहचान, आरक्षण के अधिकार और धार्मिक धर्मांतरण पर एक तीखी राष्ट्रीय और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है।

आयोजकों का दावा है कि यह आंदोलन केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के मूल अस्तित्व, रीति-रिवाजों और पारंपरिक पूजा पद्धतियों की रक्षा के लिए है। उनका आरोप है कि आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ते धार्मिक धर्मांतरण के कारण उनकी मूल संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है।

इस रैली को लेकर गुजरात में माहौल काफी गरमाया हुआ है। वहां के विभिन्न जिलों से लगभग 6,000 आदिवासी कार्यकर्ता और नेता दिल्ली के लिए रवाना हुए हैं। जनजाति कल्याण आश्रम (गुजरात प्रांत) के महासचिव योगेश गामित के अनुसार, गुजरात से ही तीन विशेष ट्रेनें बुक की गई हैं, जो गोधरा और भरूच जैसे क्षेत्रों से हजारों आदिवासियों को लेकर दिल्ली पहुंची हैं। दक्षिण गुजरात के नवसारी में भी हजारों आदिवासियों ने एक भव्य रैली निकालकर अपना शक्ति प्रदर्शन किया।

इस पूरे आंदोलन के केंद्र में डीलिस्टिंग की मांग है। इसके तहत संविधान के तहत अनुसूचित जनजाति श्रेणी से उन आदिवासियों को हटाने का प्रस्ताव है जिन्होंने दूसरा धर्म अपना लिया है। वर्तमान में, एसटी श्रेणी में शामिल लोगों को शिक्षा, सरकारी नौकरियों, चुनावों और कल्याणकारी योजनाओं में आरक्षण का लाभ मिलता है। जनजाति कल्याण आश्रम के नेता अतुल वालवी का तर्क है कि जो लोग धर्मांतरण के बाद अपनी मूल आदिवासी संस्कृति, रीति-रिवाजों और पूजा प्रणालियों को छोड़ चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजातियों के लिए मिलने वाले लाभों का हकदार नहीं होना चाहिए। यह लाभ केवल उन्हीं तक सीमित रहना चाहिए जो अभी भी पारंपरिक आदिवासी आस्था और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े हैं।