अपने पूर्व आदेश में की टिप्पणियां वापस ले ली
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तीन शिक्षाविद इसमें सीधे फंसे थे
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पूर्व के आदेश में कड़ा आदेश था
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अपनी उन टिप्पणियों को वापस लिया
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अपने पूर्व के एक आदेश में की गई कड़ी टिप्पणियों को वापस ले लिया है। यह पूरा मामला राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की एक पाठ्यपुस्तक के अध्याय से उपजे विवाद से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर न्यायपालिका के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर कुछ आपत्तिजनक सामग्री शामिल की गई थी।
इससे पहले, 11 मार्च को शीर्ष अदालत ने इस विषय पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और अन्य संबंधित शैक्षणिक संस्थानों को एक निर्देश जारी किया था। उस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वे इस पुस्तक और विवादित सामग्री को तैयार करने में शामिल रहे तीन प्रमुख शिक्षाविदों से खुद को पूरी तरह से अलग कर लें। न्यायालय के इस निर्देश को शैक्षणिक और प्रशासनिक हल्कों में उन शिक्षाविदों के करियर और प्रतिष्ठा के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा था।
शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने मामले के विभिन्न पहलुओं और शिक्षाविदों के पक्षों पर पुनर्विचार किया। इसके बाद पीठ ने माना कि पूर्व के आदेश में इस्तेमाल की गई भाषा और की गई टिप्पणियां आवश्यकता से अधिक सख्त थीं। अदालत ने अपने रुख में नरमी लाते हुए उन टिप्पणियों को आधिकारिक रूप से वापस लेने का निर्णय लिया, जिससे इन तीन शिक्षाविदों को एक बड़ी राहत मिली है।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब कक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा रही इस पुस्तक में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को लेकर कुछ गंभीर टिप्पणियां रेखांकित की गई थीं। इस पर कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर तीखी आपत्ति जताई गई, जिसके बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया।
अदालत द्वारा अपने ही आदेश में किए गए इस संशोधन को इस संदर्भ में देखा जा रहा है कि न्यायपालिका ने जहां एक ओर संवेदनशील विषयों पर सामग्री की प्रामाणिकता और गरिमा बनाए रखने पर जोर दिया है, वहीं दूसरी ओर शिक्षाविदों के खिलाफ की गई अत्यधिक कड़े प्रशासनिक और मौखिक रुख में संतुलन बनाने का प्रयास किया है।