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यह ऑपरेशन लोट्स भी अकारण नहीं है

भारतीय राजनीति के समकालीन परिदृश्य में ऑपरेशन लोटस शब्द अब केवल सत्ता परिवर्तन का पर्याय नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी सूक्ष्म और रणनीतिक प्रक्रिया बन चुका है जो विपक्षी दलों के वैचारिक और संगठनात्मक आधार को जड़ से हिलाने की क्षमता रखती है। हाल ही में आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों का सामूहिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना इसी रणनीति का सबसे परिष्कृत उदाहरण है।

यह घटनाक्रम केवल एक दलबदल नहीं है, बल्कि यह दिल्ली, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में आप के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने की एक सोची-समझी बिसात है। पंजाब में भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार भाजपा की राष्ट्रीय विस्तारवादी नीति के सामने एक बड़ी बाधा बनकर उभरी है। पिछले छह महीनों में मान सरकार ने अपनी गारंटियों को धरातल पर उतारने के लिए आक्रामक रुख अपनाया है।

पंजाब सरकार द्वारा महिलाओं के लिए शुरू की गई मावां-धीयां सत्कार योजना (₹1000-₹1500 मासिक सहायता), बिजली दरों में ₹1.5 प्रति यूनिट की कटौती और स्वास्थ्य बीमा का दायरा ₹10 लाख तक बढ़ाना—ये ऐसे कदम हैं जिन्होंने आप की पकड़ को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मजबूत किया है।

भाजपा के लिए चिंता का विषय यह है कि पंजाब की हर प्रशासनिक सफलता का सीधा असर दिल्ली की राजनीति पर पड़ रहा है। दिल्ली में रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली वर्तमान भाजपा सरकार के लिए लोकप्रियता बचाना कठिन हो रहा है, क्योंकि दिल्ली की जनता पंजाब के मुफ्त बिजली और बेहतर स्वास्थ्य मॉडल की तुलना वर्तमान दिल्ली प्रशासन से कर रही है।

दलबदल करने वाले सात सांसदों में से छह का पंजाब से होना एक गहरा राजनीतिक संदेश है। राघव चड्ढा, जो पंजाब में पार्टी के चेहरे और रणनीतिकार थे, और संदीप पाठक, जो संगठन के वास्तुकार माने जाते हैं, उनका हटना यह दर्शाता है कि भाजपा आप के पंजाब मॉडल को नेतृत्वविहीन करना चाहती है।

यह विद्रोह मुख्यमंत्री भगवंत मान की राजनीतिक स्थिरता को चुनौती देने और केंद्र के साथ उनकी सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर करने का एक सीधा प्रयास है। भाजपा के लिए गुजरात केवल एक राज्य नहीं, बल्कि उसकी पहचान और शक्ति का प्रतीक है। दशकों से वहां किसी तीसरे विकल्प को पनपने नहीं दिया गया, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनावों और उसके बाद के घटनाक्रमों ने इस धारणा को बदल दिया है।

आप ने गुजरात में पारंपरिक कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाकर खुद को एक प्रभावी विकल्प के रूप में स्थापित किया है। अप्रैल 2026 के स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले मनीष सिसोदिया के तूफानी दौरों और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की बढ़ती फौज ने भाजपा के रणनीतिकारों को सतर्क कर दिया है।

संदीप पाठक जैसे नेताओं का भाजपा में जाना आप की गुजरात ईकाई के लिए एक सर्जिकल स्ट्राइक जैसा है। पाठक को गुजरात की सूक्ष्म राजनीति का मास्टरमाइंड माना जाता था। उनके जाने से पार्टी के पास आगामी विधानसभा चुनावों के लिए कोई ठोस दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नहीं बचा है। सोशल मीडिया पेजों को ब्लॉक करने और कानूनी बाधाएं खड़ी करने के आरोपों के बीच यह दलबदल आप की बढ़ती लोकप्रियता को कुचलने का एक प्रभावी औजार सिद्ध हुआ है।

इस बार का ऑपरेशन लोटस पिछले अनुभवों से अलग और अधिक परिष्कृत है। पहले जहां केवल विधायकों को तोड़कर सरकारें गिराने पर ध्यान दिया जाता था, वहीं अब सीधे संवैधानिक प्रावधानों (दलबदल विरोधी कानून की धारा 4) का उपयोग किया जा रहा है। संविधान के अनुसार, यदि किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता।

आप के 10 में से 7 सांसदों का जाना इसी गणित का हिस्सा है। भाजपा की यह रणनीति दोतरफा है। पहला, पंजाब में सुशासन की साख को गिराना ताकि आप का राष्ट्रीय विस्तार रुक सके। दूसरा, गुजरात जैसे कोर राज्यों में किसी भी उभरते हुए प्रतिद्वंद्वी को जड़ से खत्म करना। दिल्ली की सत्ता खोने के बाद (रेखा गुप्ता सरकार के आने से), पंजाब और गुजरात ही वे दो स्तंभ थे जिनके दम पर अरविंद केजरीवाल अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को जीवित रखे हुए थे।

यदि इन दोनों राज्यों में संगठन और नेतृत्व का संकट बना रहा, तो आप के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाना नामुमकिन हो जाएगा। भारतीय राजनीति का यह नया चरण यह स्पष्ट करता है कि अब युद्ध केवल चुनाव मैदान में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर, संगठन के भीतर और संवैधानिक गलियारों में लड़ा जा रहा है। ऑपरेशन लोटस का यह नया अवतार विपक्षी दलों के लिए एक चेतावनी है कि सुशासन और लोकप्रियता के साथ-साथ संगठनात्मक वफादारी को बचाए रखना ही भविष्य की राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती होगी।