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हेमंत को पहले से ही कई बातों का अंदेशा था

दीनदयाल नगर में बन रहा था कांग्रेस का डैमेज प्लान

  • झामुमो को वहां तीर कमान कैसे मिला

  • बीएनआर की बैठक में सहमति क्यों नहीं

  • नेता और मीडिया का ज्वाइंट ऑपरेशन

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का असम विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला महज एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि उनकी गहरी रणनीतिक सोच और खुफिया तंत्र की पकड़ का परिणाम माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह निर्णय असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की झारखंड में सक्रियता और कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को भांपने के बाद लिया गया है।

खबरों के अनुसार, रांची में हिमंता बिस्वा सरमा की गतिविधियों के दौरान हेमंत सोरेन का खुफिया तंत्र काफी सक्रिय था। उन्होंने न केवल अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, बल्कि उनके संपर्क में रहने वाले मीडिया कर्मियों की भी पहचान कर ली थी। चुनाव जीतने के बाद भी सोरेन ने अपने गुप्त शत्रुओं पर निगरानी ढीली नहीं की। उन्हें इस बात का आभास था कि परदे के पीछे कौन उनके खिलाफ चक्रव्यूह रच रहा है।

असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई और अन्य वरिष्ठ नेताओं की हालिया रांची यात्रा ने कई सवाल खड़े किए थे। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री आवास पर हुई बैठक में केवल तीन चुनिंदा नेताओं को ही प्रवेश मिला, जबकि स्थानीय नेताओं को बाहर ही रोक दिया गया। इस गुप्त मंत्रणा के बाद गठबंधन की खबरें उड़ीं, जिस पर सोरेन ने चुप्पी साधे रखी। लेकिन जब चुनाव आयोग ने प्रतीकों का आवंटन किया, तो अचानक झामुमो प्रत्याशियों की घोषणा ने सबको चौंका दिया। इससे स्पष्ट है कि सोरेन एक गुप्त चैनल के जरिए असम में उम्मीदवारों की सूची पहले ही तैयार कर चुके थे।

असम में झामुमो को तीर-कमान का चुनाव चिह्न मिलना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए पहेली बना हुआ है। आमतौर पर ऐसे आरक्षित प्रतीक राष्ट्रीय पार्टियों या मजबूत क्षेत्रीय आधार वाले दलों को मिलते हैं। असम में झामुमो का कोई पिछला चुनावी रिकॉर्ड न होने के बावजूद चुनाव आयोग का यह आवंटन कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ता है, जो कहीं न कहीं पर्दे के पीछे की बड़ी सेटिंग की ओर इशारा करते हैं।

झामुमो की इस रणनीति की कड़ियाँ रांची के स्थानीय निकाय चुनाव और दीनदयाल नगर स्थित एक सरकारी आवास से भी जुड़ती हैं। रांची डिप्टी मेयर चुनाव में भाजपा की जीत और कांग्रेस समर्थित पार्षदों के बीच सहमति न बन पाना सोरेन की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ वे अपनों को ही किनारे कर रहे हैं। खबर है कि दीनदयाल नगर के एक सरकारी आवास में देर रात होने वाली बैठकियों में मीडिया के जरिए कांग्रेस नेताओं की छवि खराब करने की योजनाएं बनती हैं। हेमंत सोरेन इस पूरी घेराबंदी से वाकिफ हैं, जबकि कांग्रेस नेतृत्व अब भी इस राजनीतिक टायर पंक्चर करने वाली रणनीति से अनभिज्ञ नजर आ रहा है।