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थोपी गयी सोच से बाहर निकलता पश्चिमी दिमाग

ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद मध्य पूर्व में उपजा संकट अभी भी जारी है। बयानों, जवाबी बयानों और अतिरंजनाओं के दौर के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प ने संभावित युद्धविराम का संकेत दिया है। हालांकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि वे वास्तव में तनाव कम करना चाहते हैं या केवल अगले सैन्य कदम के लिए समय निकाल रहे हैं।

पश्चिम में कई लोगों के लिए, ईरान एक ऐसा देश है जिसका आधुनिकता की ओर बढ़ता सफर 1979 की इस्लामी क्रांति ने पटरी से उतार दिया था। जब से अली खामेनेई सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे, ईरान काफी हद तक अलग-थलग रहा है और इसे अक्सर एक अछूत राष्ट्र के रूप में चित्रित किया गया है।

अधिकांश अमेरिकियों और यूरोपीय लोगों के लिए, ईरान की छवि धार्मिक अधिनायकवाद, मानवाधिकारों के दमन और ट्रांसअटलांटिक गठबंधन के लिए एक परमाणु खतरे के रूप में गढ़ी गई है। अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों ने अन्य देशों के लिए इस मध्य पूर्वी शक्ति के साथ राजनयिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध बनाए रखना मुश्किल बना दिया है।

साल 2003 में, अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने ईरान के कट्टर प्रतिद्वंद्वी इराक पर हमला किया था। उस हमले का बार-बार दोहराया जाने वाला औचित्य यह था कि सद्दाम हुसैन के इराक के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं जो पूरी दुनिया को खतरे में डाल सकते हैं। बाद में ये आरोप एक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं निकले लेकिन तब तक इराक युद्ध से तबाह हो चुका था।

हालांकि, उस समय पश्चिम में सार्वजनिक धारणा काफी हद तक इराक युद्ध के पक्ष में थी। इसके पीछे कुछ स्पष्ट कारण थे। इराक युद्ध 2001 के भयानक 9/11 आतंकवादी हमलों के बाद शुरू हुआ था। यह एक तथ्य था कि इराकी सरकार का उस आतंकी कृत्य से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों और यूरोप के लोगों को यह समझाने में काफी हद तक सफल रही कि अधिनायकवादी शासन वाले देशों से उत्पन्न आतंकवाद के खिलाफ बड़ी लड़ाई में सद्दाम हुसैन के खिलाफ युद्ध अपरिहार्य था।

लेकिन इराक और अफगानिस्तान से अमेरिका की अपमानजनक विदाई के बाद, अमेरिकी जनता को यह स्पष्ट हो गया कि विदेशी आक्रमणों के परिणाम शायद ही कभी सकारात्मक होते हैं, चाहे वह आर्थिक रूप से हो या राजनीतिक रूप से। ईरान के प्रति परयापन के लंबे इतिहास के बावजूद, पश्चिम में बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि अमेरिका एक सीधे और बड़े पैमाने के सैन्य टकराव में उतरेगा।

हालिया सैन्य जमावड़े को व्यापक रूप से इस्लामी गणराज्य को पश्चिमी शर्तों पर परमाणु समझौते के लिए मजबूर करने के एक दबाव तंत्र के रूप में देखा गया था। शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों के बयान संकेत देते हैं कि ईरान के साथ युद्ध का मानवाधिकारों की स्थिति सुधारने या लोकतंत्र स्थापित करने जैसे किसी उच्च आदर्श से कोई लेना-देना नहीं है।

अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को दो टूक शब्दों में परिभाषित करते हुए घोषणा की कि इसमें नियमों का कोई मूर्खतापूर्ण बंधन नहीं होगा, राष्ट्र-निर्माण का कोई दलदल नहीं होगा, लोकतंत्र-निर्माण का कोई अभ्यास नहीं होगा और कोई पॉलिटिकली करेक्ट युद्ध नहीं होगा। एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह हो रहा है कि अमेरिका और यूरोप में इजराइल को खुद कैसे देखा जा रहा है।

ट्रम्प समर्थकों के बीच अत्यधिक प्रभाव रखने वाले रूढ़िवादी टॉक शो होस्ट टकर कार्लसन, युद्ध की वकालत करने वाले अमेरिकी राजनेताओं के इजराइल समर्थक रुख के खुले आलोचक के रूप में उभरे हैं। उनका कहना है कि इजराइल को अमेरिका की परवाह नहीं है और वह मुख्य रूप से अपने स्वयं के एजेंडे को लेकर चिंतित है।

आजकल, कई पश्चिमी लोगों को यह पूछते हुए देखा जा सकता है, क्या यह हमारा युद्ध है या इजराइल का? यूरोपीय लोगों की बढ़ती संख्या अब गाजा में इजराइल के युद्ध को ट्रम्प प्रशासन द्वारा समर्थित नरसंहार के रूप में देखती है। व्यापक रूप से यह धारणा जोर पकड़ रही है कि ईरान के साथ संघर्ष सुरक्षा खतरों या मानवाधिकारों की चिंता से कम और इजराइल के प्रति निष्ठा से अधिक प्रेरित है।

जैसे-जैसे मानवीय संकट गहरा रहा है, एक ईरानी प्राथमिक विद्यालय पर अमेरिकी हवाई हमलों—जिसमें 165 से अधिक लड़कियां मारी गईं—ने पश्चिमी दुनिया में एक गहरा नैतिक असंतोष पैदा कर दिया है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है और अधिक खूनी हो जाता है, तो ईरान को पूरे पश्चिम में एक अछूत राष्ट्र के रूप में कम और साम्राज्यवादी दबाव का विरोध करने वाले राष्ट्र के रूप में अधिक देखा जा सकता है। अंततः, यह विमर्श की लड़ाई ही होगी जो तय करेगी कि वाशिंगटन इस युद्ध को जारी रख पाएगा या उसे पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ेगा।