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अब खुलकर राज्य सरकार के खिलाफ फैसले ले रहा चुनाव आयोग

तमाम डीएम को बंगला खाली करने को कहा

  • अनेक जिलाधिकारियों का किया है तबादला

  • नये अफसरों से कहा बंगला पर भी कब्जा लें

  • अपने किस्म के पहले आदेश की आलोचना

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः भारत निर्वाचन आयोग ने चुनावी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के नाम पर एक अभूतपूर्व और कड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले पैनल ने नए नियुक्त जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपने पूर्ववर्तियों (पुराने डीएम) से तत्काल उनके सरकारी बंगले खाली करवाएं। यह कदम उन 11 जिलाधिकारियों के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करने के लिए उठाया गया है जिन्हें आयोग ने हाल ही में चुनाव प्रक्रिया में संभावित हस्तक्षेप के संदेह में पद से हटाया था।

आयोग के सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ चुनावों में यह देखा गया था कि हटाए गए अधिकारी अपने आधिकारिक बंगलों पर कब्जा जमाए रखते थे, जिसके कारण नए नियुक्त अधिकारियों को सर्किट हाउस से काम करना पड़ता था। इससे चुनावी मशीनरी के बीच यह गलत संदेश जाता था कि चुनाव बाद पुराने अधिकारी वापस लौट आएंगे, जिसके फलस्वरूप निचले स्तर के कर्मचारी नए जिलाधिकारियों के निर्देशों का पालन करने में हिचकिचाते थे। आयोग इस बार ऐसी किसी भी समानांतर सत्ता को पनपने नहीं देना चाहता।

पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच यह मामला अब कानूनी मोड़ ले चुका है। आयोग ने राज्य सरकार से परामर्श किए बिना 11 जिलाधिकारियों को बदल दिया और उनमें से पांच को चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में तमिलनाडु भेज दिया है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने इस निर्णय को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।

उनका तर्क है कि आदर्श आचार संहिता के दौरान आयोग तबादले तो कर सकता है, लेकिन अधिकारियों को दूसरे राज्यों में भेजने का अधिकार उसके पास नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की खंडपीठ सोमवार को इस पर सुनवाई करेगी।

चुनाव आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों के लिए छह प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए हैं। केंद्रीय बलों की उचित तैनाती से हिंसा रोकना। मतदाताओं को डराने-धमकाने की घटनाओं पर अंकुश। फर्जी या छद्म मतदान को पूरी तरह रोकना। बूथ जाम करने की कोशिशों को विफल करना। मतदान केंद्रों के आसपास राजनीतिक प्रभाव को खत्म करना। अधिकारियों को बिना किसी प्रशासनिक दबाव के स्वतंत्र रूप से कार्य करने देना।

आयोग का यह सख्त संदेश स्पष्ट है कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर पक्षपात या हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ जानकार इसे वर्तमान राज्य सरकार को लगातार उलझाये रखने की नई चाल समझ रहे हैं क्योंकि ममता बनर्जी की सरकार के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त का रिश्ता कड़वा हो चुका है।