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हम तेरे प्यार में सारा आलम .. .. .. ..

दुनिया के रंगमंच पर इन दिनों एक ऐसा नाटक चल रहा है, जिसे देखकर शेक्सपियर भी अपनी कब्र में करवटें बदल रहे होंगे। इस नाटक के मुख्य पात्र हैं—एक तरफ अंकल सैम (अमेरिका), जो हाथ में प्रतिबंधों का डंडा और व्यापार की गाजर लिए खड़े हैं, और दूसरी तरफ हमारा न्यू इंडिया, जो रूसी तेल की बाल्टी लेकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा की दीवारें पुताई कर रहा है। अमेरिका और भारत की कूटनीति आजकल उस मोहल्ले के प्यार जैसी हो गई है, जहाँ प्रेमी (अमेरिका) चाहता है कि प्रेमिका (भारत) केवल उसकी पसंद की सब्ज़ी खाए, लेकिन प्रेमिका को पड़ोस वाले रूसी व्लादिमीर के घर से आने वाला डिस्काउंटेड तेल ज़्यादा रास आ रहा है।

मजेदार बात यह है कि इधर दिल्ली की रायसीना हिल्स से मंद-मंद मुस्कुराहटें आ रही हैं। भारत ने न तो तेल खरीदना बंद किया और न ही अमेरिका की बात को आधिकारिक तौर पर खारिज किया। बस एक मौन साधे रखा। यह मौन वैसा ही है जैसा एक समझदार गृहणी का होता है, जो पति से कहती है कि हाँ-हाँ, मैं बाहर का जंक फूड नहीं खाऊँगी, और फिर चुपके से पड़ोस वाली आंटी के हाथ का समोसा चट कर जाती है क्योंकि वह सस्ता भी है और स्वाद भी!

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म दिल एक मंदिर का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने औऱ संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे लता मंगेशकर ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं:

हम तेरे प्यार में सारा आलम

खो बैठे हैं, खो बैठे

तुम कहते हो के ऐसे प्यार को

भूल जाओ, भूल जाओ

हम तेरे प्यार में सारा आलम

खो बैठे हैं, खो बैठे

तुम कहते हो के ऐसे प्यार को

भूल जाओ, भूल जाओ

हम तेरे प्यार में सारा आलम—

पंछी से छुड़ाकर उसका घर

तुम अपने घर पर ले आए

ये प्यार का पिंजरा मन भाया

हम जी भर-भर के मुस्काए

जब प्यार हुआ इस पिंजरे से

तुम कहने लगे आज़ाद रहो

हम कैसे भुलाएँ प्यार तेरा

तुम अपनी ज़ुबां से ये न कहो

अब तुमसा जहाँ में कोई नहीं

हम तो तुम्हारे हो बैठे

तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को

भूल जाओ, भूल जाओ

हम तेरे प्यार में सारा आलम—

इस तेरे चरण की धूल से हमने

अपनी जीवन माँग भरी

तभी तो सुहागन कहलायी

दुनिया के नज़र में प्यार बनी

तुम प्यार की सुंदर मूरत हो

और प्यार हमारी पूजा है

अब इन चरणों में दम निकले

बस इतनी और तमन्ना है

हम प्यार के गंगाजल से, बलम जी

तन-मन अपना धो बैठे

तुम कहते हो के ऐसे प्यार को

भूल जाओ, भूल जाओ

हम तेरे प्यार में सारा आलम—

सपनों का दर्पण देखा था

सपनों का दर्पण तोड़ दिया

ये प्यार का आँचल हमने तो

दामन से तुम्हारे बाँध लिया

ये ऐसी गाँठ है उल्फ़त की

जिसको ना कोई भी खोल सका

तुम आन बसे जब इस दिल में

दिल फिर तो कहीं ना डोल सका

ओ,प्यार के सागर हम तेरी

लहरों में नाव डुबो बैठे

तुम कहते हो के ऐसे प्यार को

भूल जाओ, भूल जाओ

हम तेरे प्यार में सारा आलम

खो बैठे हैं, खो बैठे

कूटनीति की इस महफ़िल में भारत भी अमेरिका से यही कह रहा है कि अंकल, आपके साथ हमने क्वाड का पिंजरा स्वीकार किया, आपके साथ व्यापारिक सुहागन बनने का नाटक भी किया, लेकिन अब जब हमें इस पिंजरे की आदत हो गई है, तो आप कभी टैरिफ लगाकर आज़ाद रहने को कहते हैं, तो कभी रूसी तेल को पाप का घड़ा बताते हैं। रूस के साथ हमारा रिश्ता उस गंगाजल जैसा है जिसे पीकर हमारा औद्योगिक तन-मन तृप्त होता है। अब अमेरिका कहता है कि इस गंगाजल को भूल जाओ और मेरा महंगा शेल गैस अपनाओ। लेकिन भारत की उल्फ़त की गाँठ रूस के साथ ऐसी बंधी है कि उसे कोई खोल नहीं सका।

अजीब विडंबना है! एक तरफ अमेरिका हमें रणनीतिक साझेदार कहता है और दूसरी तरफ हमारी रिफाइनरियों की ओर बढ़ते रूसी टैंकरों पर उपग्रह से नज़र रखता है। यह तो वही बात हुई कि प्यार भी करेंगे और जासूसी भी। और अंत में जब भारत नहीं मानता, तो एक छोटा सा 30 दिन का डिस्काउंट पीरियड देकर खुद को तसल्ली दे देते हैं कि चलो, कम से कम हमारे डर से 30 दिन की परमिशन तो ली!

मगर हकीकत तो यह है कि इस कूटनीतिक समंदर में भारत ने अपनी नाव ऐसी जगह डुबोई है (यानी फंसाई है), जहाँ से उसे रूस का सस्ता तेल भी मिलता रहे और अमेरिका का प्यार भरा पिंजरा भी सलामत रहे। अंकल सैम चिल्लाते रहें भूल जाओ, मगर भारत कहता है—साहब, राष्ट्रहित सर्वोपरि है, प्यार-व्यार तो चलता रहेगा!