मोदी के गार्जियन के दावे पर सवाल उठाये
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः अक्टूबर 2026 के अंत में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने नौसेना की वर्दी में भारतीय समुद्री योद्धाओं को संबोधित करते हुए गर्व से घोषणा की थी कि भारतीय नौसेना हिंद महासागर की रक्षक (गार्जियन) है। उन्होंने इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व और यहाँ से होने वाले विशाल व्यापार व तेल आपूर्ति का उल्लेख किया था। लेकिन पांच महीने से भी कम समय में, इस रक्षक की छवि पर गहरा आघात लगा है।
ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस देना भारत द्वारा आयोजित द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास मिलन में भाग लेकर वापस लौट रहा था। बुधवार को श्रीलंका के दक्षिण में मात्र 44 समुद्री मील (81 किमी) की दूरी पर एक अमेरिकी पनडुब्बी ने इसे टारपीडो से निशाना बनाकर डुबो दिया। इस हमले में 80 से अधिक ईरानी नाविकों की मौत हो गई, जबकि 32 को श्रीलंकाई नौसेना ने बचाया। यह घटना भारत के लिए विशेष रूप से शर्मनाक है क्योंकि यह पोत भारत के निमंत्रण पर अतिथि के रूप में आया था। हमले के 24 घंटे बाद तक भारतीय नौसेना की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया। अमेरिका ने स्पष्ट किया कि यह हमला डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध विस्तार का संकेत है।
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि भारत इस समय एक कठिन दुविधा में फंस गया है। यदि भारत को इस अमेरिकी हमले की पूर्व जानकारी थी, तो इसका अर्थ है कि उसने अपने रणनीतिक साझेदार अमेरिका का साथ देकर एक अतिथि देश (ईरान) के साथ विश्वासघात किया। और यदि भारत को इसकी जानकारी नहीं थी, तो यह उसकी खुफिया क्षमता और नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर होने के दावे पर बड़ा प्रश्नचिह्न है कि उसकी अपनी बैकयार्ड में परमाणु पनडुब्बी ने इतना बड़ा हमला कर दिया।
पूर्व नौसेना प्रमुखों और विश्लेषकों के अनुसार, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता अब पूरी तरह अमेरिका और इजरायल की ओर झुकती दिख रही है। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले पीएम मोदी की इजरायल यात्रा और ईरानी सर्वोच्च नेता की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी इसी ओर इशारा करती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने भारत के राष्ट्रीय हितों और दशकों पुरानी संतुलित विदेश नीति को ताक पर रख दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना से पश्चिम एशिया में भारत की साख और विश्वसनीयता को दीर्घकालिक नुकसान पहुँच सकता है।