प्रत्याशियों की टेंशन बढ़ा रहा कम मतदान
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अनेक लोग मतदान केंद्रों से बैरंग लौटे
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केंद्रों पर कुप्रबंधन और सूचना का अभाव
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वार्डों का परिसीमन और बदलता भूगोल
राष्ट्रीय खबर
रांचीः हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम चुनावों में राज्य चुनाव आयोग की प्रशासनिक दूरदर्शिता की कमी स्पष्ट रूप से धरातल पर दिखाई दी। चुनाव प्रबंधन में बरती गई लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा उन नए मतदाताओं को भुगतना पड़ा, जो पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने उत्साह के साथ पहुंचे थे।
डिजिटल इंडिया के दौर में जहां एक ओर आयोग ने पोर्टल पर नए मतदाताओं के नाम दर्ज होने की पुष्टि की थी, वहीं जमीनी हकीकत इसके उलट रही। मतदान केंद्रों पर तैनात पीठासीन अधिकारियों को जो मतदाता सूची उपलब्ध कराई गई थी, वह अपडेटेड नहीं थी। पुरानी सूची के आधार पर मतदान कराए जाने के कारण सैकड़ों मतदाता अपने नाम पोर्टल पर देखने के बावजूद वोट डालने से वंचित रह गए और उन्हें मायूस होकर घर लौटना पड़ा।
मतदान के दिन प्रथमार्ध (सुबह के समय) में मतदाताओं की बेहद कम भागीदारी ने चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। दोपहर एक बजे तक मतदान का औसत लगभग 40 प्रतिशत के करीब दर्ज किया गया। राजनीतिक गलियारों में यह माना जाता है कि कम मतदान का सीधा असर हार-जीत के अंतर पर पड़ता है, जिससे उलटफेर की संभावना बढ़ जाती है। इसी मार्जिन के डर से दोपहर बाद प्रत्याशी और उनके समर्थक सक्रिय हो गए। कार्यकर्ताओं की टोली घर-घर जाकर वोटरों को केंद्र तक लाने की जद्दोजहद करती देखी गई, ताकि एक-एक वोट सुनिश्चित किया जा सके।
अव्यवस्था का आलम उन केंद्रों पर अधिक रहा, जहाँ चार या उससे अधिक बूथ बनाए गए थे। वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों और चुनाव अधिकारियों के बीच समन्वय की भारी कमी दिखी। अधिकारियों के पास इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि किस वार्ड या क्षेत्र का वोट किस कमरे में पड़ रहा है। मार्गदर्शन के अभाव में बुजुर्गों और दिव्यांगों को भी एक बूथ से दूसरे बूथ भटकते देखा गया। हालांकि, शहरी और जागरूक इलाकों में दोपहर बाद सुखद तस्वीर देखने को मिली, जहाँ घरेलू कामकाज निपटाने के बाद महिला मतदाताओं की लंबी कतारें नजर आईं।
चुनाव में भ्रम की एक बड़ी वजह वार्डों की बदलती भौगोलिक स्थिति और वार्ड संख्याओं में हुआ फेरबदल रहा। कई मतदाता अपने वर्षों पुराने मतदान केंद्रों पर पहुँचे, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें पता चला कि परिसीमन के कारण उनका केंद्र बदल चुका है। शहर के कई पुराने मोहल्लों को उनके पारंपरिक वार्डों से हटाकर नए वार्डों में जोड़ दिया गया है, जिसकी पूर्व सूचना या स्पष्ट मानचित्रण जनता के बीच नहीं था। इस भौगोलिक बदलाव और तकनीकी खामियों ने न केवल मतदाताओं को परेशान किया, बल्कि चुनाव की पारदर्शिता और व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।