Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Indo MIM IPO: इंडो एमआईएम का 3812 करोड़ का आईपीओ 23 जुलाई से खुलेगा, जानें प्राइस बैंड और पूरी डिटेल Dishani Chakraborty Boyfriend: मिथुन चक्रवर्ती की बेटी दिशानी का ब्राइडल लुक वायरल, खूबसूरती देख दीव... Kids Constipation Remedies: बच्चों में कब्ज की समस्या दूर करेंगे ये 5 फल, पेट साफ होना होगा आसान Kidney Cancer Symptoms: सिर्फ दर्द ही नहीं, शरीर के ये 7 संकेत भी हो सकते हैं किडनी कैंसर का इशारा SpiceJet Acquisition: स्पाइसजेट को खरीदेगी गल्फ एयरलाइन? निवेश और अधिग्रहण को लेकर शुरुआती बातचीत शु... China Floods: चीन के 1 लाख बांध बने मुसीबत, बिना चेतावनी पानी छोड़ने से कई गांवों में भारी तबाही Nepal Coin Map Controversy: नेपाल ने 1 रुपये के सिक्के से हटाया विवादित नक्शा, अब होगी बौद्ध मठ की त... वर्फीले प्रदेश में सोना उगल रहा है माउंट एरेबस, देखें वीडियो Zohran Mamdani on Netanyahu: क्या अमेरिका में गिरफ्तार होंगे नेतन्याहू? न्यूयॉर्क के मेयर के बयान पर... Campa Cola Market Share: रिलायंस 'कैंपा' ने कोल्ड ड्रिंक बाजार में मचाया तहलका, पेप्सी और कोका-कोला ...

घोर अव्यवस्था के बीच नये वोटरों का नाम नहीं जुड़ा

प्रत्याशियों की टेंशन बढ़ा रहा कम मतदान

  • अनेक लोग मतदान केंद्रों से बैरंग लौटे

  • केंद्रों पर कुप्रबंधन और सूचना का अभाव

  • वार्डों का परिसीमन और बदलता भूगोल

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम चुनावों में राज्य चुनाव आयोग की प्रशासनिक दूरदर्शिता की कमी स्पष्ट रूप से धरातल पर दिखाई दी। चुनाव प्रबंधन में बरती गई लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा उन नए मतदाताओं को भुगतना पड़ा, जो पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने उत्साह के साथ पहुंचे थे।

डिजिटल इंडिया के दौर में जहां एक ओर आयोग ने पोर्टल पर नए मतदाताओं के नाम दर्ज होने की पुष्टि की थी, वहीं जमीनी हकीकत इसके उलट रही। मतदान केंद्रों पर तैनात पीठासीन अधिकारियों को जो मतदाता सूची उपलब्ध कराई गई थी, वह अपडेटेड नहीं थी। पुरानी सूची के आधार पर मतदान कराए जाने के कारण सैकड़ों मतदाता अपने नाम पोर्टल पर देखने के बावजूद वोट डालने से वंचित रह गए और उन्हें मायूस होकर घर लौटना पड़ा।

मतदान के दिन प्रथमार्ध (सुबह के समय) में मतदाताओं की बेहद कम भागीदारी ने चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। दोपहर एक बजे तक मतदान का औसत लगभग 40 प्रतिशत के करीब दर्ज किया गया। राजनीतिक गलियारों में यह माना जाता है कि कम मतदान का सीधा असर हार-जीत के अंतर पर पड़ता है, जिससे उलटफेर की संभावना बढ़ जाती है। इसी मार्जिन के डर से दोपहर बाद प्रत्याशी और उनके समर्थक सक्रिय हो गए। कार्यकर्ताओं की टोली घर-घर जाकर वोटरों को केंद्र तक लाने की जद्दोजहद करती देखी गई, ताकि एक-एक वोट सुनिश्चित किया जा सके।

अव्यवस्था का आलम उन केंद्रों पर अधिक रहा, जहाँ चार या उससे अधिक बूथ बनाए गए थे। वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों और चुनाव अधिकारियों के बीच समन्वय की भारी कमी दिखी। अधिकारियों के पास इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि किस वार्ड या क्षेत्र का वोट किस कमरे में पड़ रहा है। मार्गदर्शन के अभाव में बुजुर्गों और दिव्यांगों को भी एक बूथ से दूसरे बूथ भटकते देखा गया। हालांकि, शहरी और जागरूक इलाकों में दोपहर बाद सुखद तस्वीर देखने को मिली, जहाँ घरेलू कामकाज निपटाने के बाद महिला मतदाताओं की लंबी कतारें नजर आईं।

चुनाव में भ्रम की एक बड़ी वजह वार्डों की बदलती भौगोलिक स्थिति और वार्ड संख्याओं में हुआ फेरबदल रहा। कई मतदाता अपने वर्षों पुराने मतदान केंद्रों पर पहुँचे, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें पता चला कि परिसीमन के कारण उनका केंद्र बदल चुका है। शहर के कई पुराने मोहल्लों को उनके पारंपरिक वार्डों से हटाकर नए वार्डों में जोड़ दिया गया है, जिसकी पूर्व सूचना या स्पष्ट मानचित्रण जनता के बीच नहीं था। इस भौगोलिक बदलाव और तकनीकी खामियों ने न केवल मतदाताओं को परेशान किया, बल्कि चुनाव की पारदर्शिता और व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।