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निगम चुनाव में सहयोगी एक दूसरे के खिलाफ

सत्ता के शीर्ष तक महसूस होगा इस दरार का दर्द

  • रोचक मुकाबले में दोस्त ही मैदान में खिलाफ

  • कार्यकर्ताओं में भ्रम और विपक्षी हमला

  • भविष्य की आशंका राज्य सरकार तक

राष्ट्रीय खबर

रांचीः  झारखंड की स्थानीय राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है। यद्यपि राज्य में होने वाले नगर निकाय चुनाव आधिकारिक तौर पर दलीय आधार पर (बिना पार्टी सिंबल के) नहीं लड़े जा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की सक्रियता ने इसे पूरी तरह चुनावी रंग में रंग दिया है। विशेष रूप से सत्तारूढ़ गठबंधन—झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के बीच तालमेल की भारी कमी चर्चा का विषय बनी हुई है। राज्य की कमान भले ही ये दल मिलकर संभाल रहे हों, लेकिन नगरों की गलियों में इनकी राहें एक-दूसरे से जुदा नजर आ रही हैं।

राजधानी रांची में मेयर और वार्ड पार्षदों के पदों के लिए मची होड़ ने गठबंधन की एकजुटता की पोल खोल दी है। यहाँ की स्थिति काफी जटिल है क्योंकि गठबंधन के घटक दलों ने अपने-अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया है। इसका परिणाम यह है कि एक ही वार्ड में झामुमो समर्थित उम्मीदवार का मुकाबला कांग्रेस या राजद समर्थित प्रत्याशी से हो रहा है। साझा रणनीति और केंद्रीय समन्वय के अभाव में चुनावी मैदान एक ‘फ्रेंडली फाइट’ के बजाय तीखे राजनीतिक संघर्ष में तब्दील हो गया है।

रांची के अलावा धनबाद, बोकारो, हजारीबाग और गिरिडीह जैसे बड़े शहरी केंद्रों में भी यही परिदृश्य दिखाई दे रहा है। स्थानीय स्तर के नेताओं ने प्रदेश नेतृत्व के निर्देशों की प्रतीक्षा करने के बजाय अपनी राजनीतिक जमीन बचाने को प्राथमिकता दी है। चूंकि निकाय चुनाव को 2026 के आगामी विधानसभा चुनाव और भविष्य के लोकसभा चुनावों का ‘सेमीफाइनल’ माना जा रहा है, इसलिए कोई भी दल अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने नहीं देना चाहता। हर पार्टी अपने जनाधार को स्वतंत्र रूप से परखने और संगठन को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है, जिससे गठबंधन की डोर ढीली पड़ती दिख रही है।

पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए यह स्थिति किसी दुविधा से कम नहीं है। एक ओर शीर्ष नेता मंचों से गठबंधन की मजबूती का गुणगान कर रहे हैं, वहीं जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ पर्चे बांट रहे हैं और रैलियां निकाल रहे हैं। इससे मतदाताओं के बीच भी एक नकारात्मक संदेश जा रहा है। विपक्षी दल इस बिखराव को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वे इसे अवसरवादी गठबंधन करार दे रहे हैं, जहाँ सत्ता के लिए तो दोस्ती है, लेकिन जनता की सेवा और स्पष्ट नीति के लिए कोई आम सहमति नहीं।

राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा पूर्व मंत्री के.एन. त्रिपाठी के उस बयान को लेकर है, जिसमें उन्होंने चुनाव बाद झामुमो और भाजपा के बीच संभावित नजदीकियों की ओर इशारा किया है। हालांकि कांग्रेस ने इसे त्रिपाठी का व्यक्तिगत विचार बताकर पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन इस तरह की टिप्पणियों ने गठबंधन के भीतर अविश्वास की खाई को गहरा कर दिया है। अंततः, इन निकाय चुनावों के परिणाम केवल शहरों की सरकार तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी निर्धारित करेंगे कि झारखंड में वर्तमान गठबंधन की उम्र कितनी लंबी है। क्या यह मतभेद केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित हैं, या फिर झारखंड की राजनीति में किसी बड़े भूकंप की आहट है, यह आने वाला समय ही बताएगा।