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बंगाल की राजनीति के आधुनिक चाणक्य अब नहीं रहे

कद्दावर नेता मुकुल राय का निधन हुआ

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः भारतीय राजनीति के एक कद्दावर स्तंभ मुकुल रॉय अब हमारे बीच नहीं रहे। वरिष्ठ राजनीतिज्ञ मुकुल रॉय ने साल्ट लेक के एक निजी अस्पताल में रात करीब डेढ़ बजे अंतिम सांस ली। उनके पुत्र शुभ्रांशु रॉय ने पिता के निधन की पुष्टि की है। मुकुल रॉय के निधन की खबर फैलते ही पूरे राजनीतिक हलके में शोक की लहर दौड़ गई है और अस्पताल के बाहर उनके प्रशंसकों की भारी भीड़ जुटने लगी है।

एक कुशल संगठनकर्ता और पूर्व रेल मंत्री 71 वर्षीय मुकुल रॉय पिछले कई महीनों से गंभीर बीमारियों के चलते कोलकाता के एक निजी अस्पताल में भर्ती थे। देश के पूर्व रेल मंत्री रहे मुकुल रॉय ने दशकों तक राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक समय में वह तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता माने जाते थे। हालांकि, बीच में वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे सक्रिय राजनीति से दूर थे।

राजनीतिक सफर और विवाद 2021 के विधानसभा चुनाव में मुकुल रॉय ने कृष्णनगर उत्तर सीट से भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की थी, लेकिन चुनाव के बाद वे वापस अपनी पुरानी पार्टी तृणमूल में लौट आए। इसके बाद विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने दल-बदल कानून के तहत उनकी विधायकी रद्द करने की मांग की थी। यह मामला कोलकाता उच्च न्यायालय से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने मानवीय आधार पर उनकी सदस्यता रद्द करने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी।

ममता बनर्जी के चाणक्य मुकुल रॉय की सांगठनिक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2012 में ममता बनर्जी ने तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटवाकर मुकुल रॉय को वह जिम्मेदारी दिलाई थी। कहा जाता था कि यदि ममता बनर्जी पार्टी का चेहरा और जनसमर्थन का केंद्र थीं, तो मुकुल रॉय पर्दे के पीछे संगठन को चलाने वाले असली कारीगर थे। बंगाल के लगभग हर ब्लॉक में उनका मजबूत नेटवर्क था।

2015 में नारद और सारदा घोटालों में नाम आने के बाद ममता बनर्जी के साथ उनके रिश्तों में खटास आई, जिसके बाद 2017 में वह भाजपा में शामिल हो गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा की 18 सीटों पर जीत के पीछे उनकी सांगठनिक रणनीति को एक बड़ा कारण माना जाता है। उनके निधन से बंगाल और देश की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।