संविधान का मूल दायित्व जनता के प्रति है
भारत का उच्चतम न्यायालय हाल के दिनों में दूसरी बार संवैधानिक प्रावधानों और उनके मूल उद्देश्यों के प्रति उदासीन दिखाई दिया है। शीर्ष अदालत का यह रवैया न केवल न्यायविदों के बीच चर्चा का विषय है, बल्कि यह सामान्य नागरिकों के मन में भी न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
ताजा मामला असम के मुख्यमंत्री से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता को राहत देने के बजाय उच्चतम न्यायालय ने उसे गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया है। यह निर्देश सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 की प्रभावकारिता पर सवाल उठाता है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा और उसका हृदय कहा था, क्योंकि यह नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है।
यह न्यायिक विवाद हिमंता बिस्वा सरमा के उस बयान और वीडियो से उपजा है, जिसमें वह मुसलमानो के खिलाफ जहर उगलते सुने जा सकते हैं अथवा वीडियो में दिख रहे हैं। दरअसल यह हिमंता की मजबूरी भी है कि वह इस चक्र में घिरे हुए हैं, जहां सिर्फ हिंदू वोट का ध्रुवीकरण ही उनकी जीत का रास्ता दिखलाता है।
जब शीर्ष अदालत ऐसे संवेदनशील मामलों में, जहाँ सीधे हस्तक्षेप की आवश्यकता हो, याचिकाकर्ता को निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों में भेज देती है, तो यह संवैधानिक उपचारों के अधिकार की मूल भावना को कमजोर करता है। याचिकाकर्ता को गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश देना जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा प्रतीत होता है, जिससे न्याय मिलने की प्रक्रिया में न केवल देरी होती है, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ उठने वाली आवाजों का मनोबल भी टूटता है।
न्यायालय की उदासीनता का दूसरा उदाहरण हाल ही में उन मामलों में देखा गया, जहाँ राज्यों के राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर अनिश्चित काल तक कुंडली मारकर बैठे रहे। निर्वाचित सरकारों द्वारा पारित विधेयकों को इस प्रकार रोकना सीधे तौर पर जनता की इच्छा और लोकतांत्रिक जनादेश का अपमान है।
कई राज्यपालों ने राज्य सरकार की सिफारिशों पर कुंडली मारकर बैठ जाना एक अभ्यास बना लिया है जो दरअसल राज्यपाल की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि वे अपने राजनीतिक आकाओं की इच्छा की पूर्ति कर रहे हैं। इन तमाम संचालनों में भारत की जनता का अरबों रुपया हर साल खर्च हो रहा है। सही मायने में संविधान की मंशा यह है कि राज्यपाल एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करें, न कि निर्वाचित विधायिका के कार्यों में अवरोधक के रूप में।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर जो अस्पष्टता दिखाई या त्वरित निर्णय लेने में जो संकोच किया, उससे यह संदेश गया कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं। राज्यपालों द्वारा विधेयकों को दबाकर रखना संसदीय लोकतंत्र की जड़ें काटने जैसा है, और ऐसे में न्यायपालिका का शांत रहना या ढुलमुल रवैया अपनाना चिंताजनक है।
उच्चतम न्यायालय को अब यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि भारतीय संविधान का उपयोग कुछ चुनिंदा मामलों में तरजीही व्यवहार देने के लिए नहीं किया जा सकता। न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी यह संकेत देती है कि कानून के सामने सब बराबर हैं, चाहे वह देश का मुख्यमंत्री हो या कोई आम नागरिक।
यदि कुछ हाई-प्रोफाइल मामलों में अदालत तुरंत संज्ञान लेती है और अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों को प्रक्रियागत जटिलताओं के नाम पर टाल देती है, तो इससे न्यायपालिका की छवि प्रभावित होती है। संविधान की व्याख्या इस तरह नहीं होनी चाहिए कि वह शक्तिशाली लोगों के लिए कवच बन जाए और कमजोरों के लिए केवल एक कानूनी पहेली।
न्यायपालिका का दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि संवैधानिक नैतिकता किसी भी राजनीतिक या व्यक्तिगत हित से ऊपर रहे। सर्वोच्च न्यायालय में देश की जनता का विश्वास अत्यंत पवित्र और अमूल्य है। लोकतंत्र में न्यायपालिका ही वह अंतिम स्तंभ है, जिस पर लोग संकट के समय भरोसा करते हैं।
यदि सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक प्रावधानों की रक्षा करने में विफल रहता है या अपनी जिम्मेदारी को अन्य न्यायालयों पर डालता रहता है, तो न्याय की यह नींव डगमगा सकती है। अदालत को यह समझना होगा कि उसके हर फैसले और उसकी हर चुप्पी का दूरगामी प्रभाव भारत के संवैधानिक भविष्य पर पड़ता है। समय की मांग है कि उच्चतम न्यायालय अपने उस गौरवशाली इतिहास को दोहराए जहाँ वह संविधान का रक्षक बनकर उभरा था, न कि केवल एक मूकदर्शक या प्रक्रियागत औपचारिकता निभाने वाली संस्था। भारतीय संविधान की इस मूल भावना को समझना जब आम आदमी के लिए बहुत आसान है तो अदालतें और सरकार इसे कैसे नहीं समझ पाती, यही भारतीय राजनीति के पतन का संकेत है।