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जिनेवा में संपन्न शांति वार्ता असफल रही

दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य मतभेद कायम

जिनेवाः स्विट्जरलैंड के जिनेवा में हाल ही में संपन्न हुई रूस और यूक्रेन के बीच की शांति वार्ता किसी बड़े समझौते या ब्रेकथ्रू पर पहुँचने में विफल रही है। अमेरिकी मध्यस्थता में हुई इस दो दिवसीय त्रिपक्षीय बैठक का उद्देश्य चार साल से जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक सामान्य धरातल खोजना था, लेकिन अंततः दोनों पक्षों के दूतों ने स्वीकार किया कि राजनीतिक और सैन्य मतभेद अभी भी काफी गहरे हैं। यह वार्ता ऐसे समय में हुई है जब अगले सप्ताह इस युद्ध की चौथी बरसी (24 फरवरी) होने वाली है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ की उपस्थिति में हुई यह वार्ता अबू धाबी और अन्य स्थानों पर हुई पिछली बैठकों का विस्तार थी। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इन वार्ताओं को बेहद कठिन और तनावपूर्ण बताया। वार्ता का दूसरा दिन उम्मीद से पहले ही समाप्त हो गया, जो यह संकेत देता है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अडिग हैं। सबसे बड़ी चुनौती पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र और अन्य कब्जाए गए इलाकों की स्थिति को लेकर है। रूस इन क्षेत्रों पर अपना पूर्ण अधिकार चाहता है, जबकि यूक्रेन अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ समझौता करने को तैयार नहीं है।

हालाँकि, जेलेंस्की ने संकेत दिया कि सैन्य स्तर पर कुछ कंस्ट्रक्टिव (रचनात्मक) चर्चा हुई है, विशेष रूप से भविष्य में संभावित युद्धविराम की निगरानी के तंत्र को लेकर। यूक्रेन का कहना है कि किसी भी युद्धविराम की निगरानी में अमेरिकी भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। दूसरी ओर, राजनीतिक मोर्चे पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। रूस की मांग है कि यूक्रेन नाटो में शामिल होने का इरादा छोड़े और अपनी सैन्य क्षमता को सीमित करे। वहीं, यूक्रेन का तर्क है कि बिना सुरक्षा गारंटियों के किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर करना रूस को भविष्य में फिर से आक्रमण करने का निमंत्रण देने जैसा होगा।

वार्ता के दौरान ही जमीन पर युद्ध की विभीषणता जारी रही। जिनेवा में बातचीत के बीच ही रूस द्वारा यूक्रेन के ऊर्जा ठिकानों पर भारी ड्रोन और मिसाइल हमले किए गए, जिससे वार्ता की मेज पर मौजूद विश्वास की कमी और बढ़ गई। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने रूस पर जानबूझकर वार्ता को खींचने का आरोप लगाया ताकि वह युद्ध के मैदान में अपनी स्थिति मजबूत कर सके। रूसी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख व्लादिमीर मेडिंस्की ने बातचीत को व्यावसायिक तो बताया, लेकिन परिणामों पर चुप्पी साधे रखी।

जिनेवा वार्ता की विफलता यह दर्शाती है कि केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव या मध्यस्थता ही इस संघर्ष को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जब तक दोनों पक्ष क्षेत्रीय संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं पर एक ठोस समाधान नहीं खोज लेते, तब तक शांति की राह कठिन बनी रहेगी। फिलहाल, दोनों पक्षों ने भविष्य में फिर से मिलने पर सहमति जताई है, लेकिन चौथे वर्ष के अंत तक भी युद्ध विराम की कोई स्पष्ट तस्वीर उभरती नहीं दिख रही है।