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म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बोरिस मर्ज़ का बड़ा बयान

अब अमेरिका अकेला फैसला नहीं कर सकता

म्यूनिखः म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2026 में जर्मन चांसलर पद के प्रमुख दावेदार बोरिस मर्ज़ के संबोधन ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में एक नई हलचल पैदा कर दी है। उनके इस भाषण को केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि भविष्य की नई विश्व व्यवस्था के रोडमैप के रूप में देखा जा रहा है। बोरिस मर्ज़ ने अपने संबोधन की शुरुआत ही एक कड़े यथार्थवाद के साथ की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह युग अब समाप्त हो चुका है जब अमेरिका अकेले ही वैश्विक निर्णयों और सुरक्षा ढांचे की दिशा तय कर सकता था।

मर्ज़ के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उभरे दो प्रमुख कारकों ने पुरानी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को यह अहसास कराया है कि उसकी सुरक्षा केवल बाहरी ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। एशिया और अफ्रीका में चीन के आर्थिक और सैन्य विस्तार ने एक नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को जन्म दिया है।

मर्ज़ का सबसे विवादास्पद और चर्चा का विषय रहने वाला तर्क यूरोपीय संप्रभुता पर आधारित था। उन्होंने यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से आह्वान किया कि वे अपनी सैन्य क्षमताओं में क्रांतिकारी वृद्धि करें। उनका मानना है कि यूरोप को अब अमेरिका पर अपनी रक्षात्मक निर्भरता कम करनी चाहिए। मर्ज़ ने प्रस्ताव दिया कि यूरोपीय देशों को एक साझा और सशक्त रक्षा बजट और एकीकृत सैन्य रणनीति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक मजबूत यूरोप ही एक स्थिर दुनिया की गारंटी दे सकता है।

मर्ज़ के इस रुख को ट्रांस-अटलांटिक संबंधों (यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच के संबंध) में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। दशकों से नाटो के भीतर अमेरिका की भूमिका एक बड़े भाई जैसी रही है, लेकिन मर्ज़ का बयान इस समीकरण को बदलने की वकालत करता है। विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि यदि मर्ज़ चांसलर बनते हैं, तो नाटो के भीतर यूरोपीय देशों का निर्णय लेने का अधिकार और वित्तीय योगदान दोनों बढ़ सकते हैं। ईयू अब वाशिंगटन के निर्देशों का इंतजार करने के बजाय अपनी स्वतंत्र रणनीतिक स्वायत्तता पर ध्यान केंद्रित करेगा।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि बोरिस मर्ज़ का यह बयान जर्मनी की पारंपरिक सावधानी भरी विदेश नीति से एक बड़ा विचलन है। यह न केवल जर्मनी के भीतर उनके नेतृत्व की छाप छोड़ता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि भविष्य में यूरोप अपनी भू-राजनीतिक पहचान को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है। यह बहस आने वाले समय में न केवल जर्मन चुनावों को प्रभावित करेगी, बल्कि यह वैश्विक मंच पर शक्ति के पुनर्वितरण की एक नई नींव भी रख सकती है।