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असली मुद्दों पर सफाई दे मोदी सरकार

भारतीय लोकतंत्र में सेना और सरकार के बीच का समन्वय देश की सुरक्षा की रीढ़ होता है। लेकिन जब देश के पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के कुछ अंश सार्वजनिक होते हैं, तो वे केवल सैन्य संस्मरण नहीं रह जाते, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक और राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन जाते हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वर्तमान बहस इस बात पर केंद्रित नहीं है कि संकट के समय निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या थी, बल्कि इस बात पर मोड़ दी गई है कि किताब छपी है या नहीं, या इसे प्रकाशित होना चाहिए था या नहीं। यह ध्यान भटकाने की एक ऐसी कला है जो वास्तविक जवाबदेही से बचने की कोशिश लगती है।

जनरल नरवणे की किताब में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर हिस्सा अगस्त 2020 के अंत में पूर्वी लद्दाख के रेजांग ला क्षेत्र में भारतीय और चीनी सेनाओं के आमने-सामने आने का विवरण है। जनरल लिखते हैं कि जब चीनी टैंकों ने भारतीय चौकियों की ओर बढ़ना शुरू किया, तो स्थिति अत्यंत विस्फोटक थी। उस समय सीमा पर तैनात कमांडरों को स्पष्ट आदेशों की दरकार थी।

किताब के दावों के अनुसार, जनरल ने रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और अन्य उच्चाधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन जो स्पष्टता और त्वरित निर्णय एक युद्ध जैसी स्थिति में अपेक्षित था, उसमें देरी देखी गई। यह देरी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और सैनिकों के जीवन से जुड़ा प्रश्न था।

यदि चीनी टैंक आगे बढ़ जाते और भारत की ओर से कोई आधिकारिक रक्षात्मक प्रतिक्रिया नहीं होती, तो परिणाम भयावह हो सकते थे। अक्सर देखा गया है कि जब भी सरकार किसी नीतिगत या निर्णय लेने की अक्षमता के कारण घिरती है, तो विमर्श को प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं की ओर मोड़ दिया जाता है।

इस मामले में भी यही हो रहा है। पूरी बहस इस पर सिमट गई है कि क्या एक पूर्व जनरल को ऐसी संवेदनशील बातें लिखनी चाहिए? क्या रक्षा मंत्रालय ने इसकी अनुमति दी? क्या किताब अभी बाजार में आई है या नहीं? ये सभी प्रश्न गौण हैं। प्राथमिक प्रश्न यह है कि क्या लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर जब हमारे जवान दुश्मन के टैंकों के सामने खड़े थे, तब दिल्ली की सत्ता के गलियारों में निर्णय लेने में हिचकिचाहट थी?

इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेना या इसे गोपनीयता का हवाला देकर दबा देना भारतीय नागरिकों के साथ अन्याय है। सरकार को किताब के उस विशिष्ट हिस्से पर स्पष्टीकरण देना चाहिए जहाँ पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत पंगुता) की बू आ रही है। यह तर्क दिया जा सकता है कि सामरिक मामलों में हर बात सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

लेकिन जनरल नरवणे कोई बाहरी व्यक्ति नहीं हैं; वे उस समय भारतीय सेना के शीर्ष पर थे। उनके द्वारा उठाया गया सवाल किसी गुप्त ऑपरेशन की जानकारी नहीं है, बल्कि डिसीजन मेकिंग यानी निर्णय प्रक्रिया की गुणवत्ता पर उठाया गया सवाल है। अतीत में हमने देखा है कि 1962 की पराजय के बाद हेंडरसन ब्रुक्स-भगत रिपोर्ट को दशकों तक दबा कर रखा गया ताकि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की गलतियों को छुपाया जा सके। क्या हम उसी इतिहास को दोहरा रहे हैं?

अगर आज का नेतृत्व यह दावा करता है कि उसकी विदेश और रक्षा नीति मजबूत और निर्णायक है, तो उसे जनरल नरवणे के इन विवरणों का सामना करने से गुरेज क्यों होना चाहिए? लोकतंत्र में सेना को राजनीति से दूर रखा जाता है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व के फैसलों का सेना पर सीधा असर पड़ता है।

जनरल नरवणे की किताब ने उस पर्दे को हटा दिया है जिसके पीछे अक्सर सब कुछ नियंत्रण में है का नैरेटिव रचा जाता है। जनता को यह जानने का हक है कि उस रात क्या हुआ था। क्या वास्तव में राजनीतिक नेतृत्व निर्णय लेने में विफल रहा था? क्या समन्वय की कमी थी? इन सवालों का जवाब देने के बजाय किताब के अस्तित्व पर ही सवाल उठाना लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत नहीं है।

यह समय छवि प्रबंधन का नहीं, बल्कि राष्ट्र प्रबंधन की वास्तविकता स्वीकार करने का है। यदि हम अपनी सामरिक गलतियों से नहीं सीखेंगे, तो भविष्य में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। यह केवल एक पुस्तक के प्रकाशन का विषय नहीं है, बल्कि भविष्य की सैन्य रणनीतियों के लिए एक सबक है। इस पूरे प्रकरण को गोपनीयता के नाम पर पर्दे के पीछे धकेलना न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि यह उन कठिन परिस्थितियों की अनदेखी करना भी है जिनसे हमारे सुरक्षा बल हर दिन जूझते हैं। तथ्यों पर आधारित जवाबदेही ही एकमात्र रास्ता है।