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वंदे मातरम के सभी छह छंदों की अनिवार्यता पर विवाद

मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने जताया कड़ा विरोध

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक समारोहों और स्कूलों में राष्ट्रगान जन गण मन से पहले ‘वंदे मातरम‘ के सभी छह छंदों को गाने के अनिवार्य निर्देश पर विवाद खड़ा हो गया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे असंवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताते हुए सरकार से अधिसूचना वापस लेने की मांग की है। बोर्ड ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो वे इसे अदालत में चुनौती देंगे।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों गुटों, माकपा, भाकपा और तृणमूल कांग्रेस ने भी इस आदेश का कड़ा विरोध किया है। माकपा ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार चुनावी लाभ के लिए जानबूझकर राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान से जुड़ा विवाद पैदा कर रही है। पार्टी ने याद दिलाया कि संविधान सभा ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के उस बयान को स्वीकार किया था, जिसमें केवल पहले दो छंदों को ही गाने की बात कही गई थी। शेष चार छंदों को उनके सांप्रदायिक संदर्भों के कारण शामिल नहीं किया गया था।

एआईएमपीएलबी के महासचिव मौलाना मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम में केवल एक ईश्वर (अल्लाह) की इबादत की अनुमति है, जबकि इस गीत के कुछ हिस्सों में बंगाल को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित कर उसकी वंदना की गई है, जो मुस्लिम मान्यताओं से सीधे टकराता है।

तृণমূল कांग्रेस ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भाजपा को बंगाल-विरोधी बताते हुए आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय की अधिसूचना ने ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित मूल गीतों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इसे अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों में कटौती करने की साजिश बताया। उन्होंने कहा कि किसी को भी अपनी आस्था के विपरीत कोई रचना गाने के लिए मजबूर करना अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। मौलाना महमूद मदनी गुट ने भी कहा कि भारत एक बहुधर्मी देश है और विविधता में एकता ही इसकी नींव है, जिसे कमजोर करना देशहित में नहीं है।