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मकड़ी के रेशम की मजबूती का राज खोजा गया

कई पदार्थों को डिजाइन करने में सहायक होगा यह नया खोज

  • स्टील से भी ज्यादा मजबूत होता है

  • दो एमिनो एसिड मिलकर इसे बनाते हैं

  • इससे बने उपकरण बेजोड़ साबित होंगे

राष्ट्रीय खबर

रांचीः शोधकर्ताओं ने हाल ही में उन आणविक क्रियाओं का खुलासा किया है जो मकड़ी के रेशम को मजबूती और लचीलेपन का एक अद्भुत मिश्रण प्रदान करती हैं। यह खोज न केवल हवाई जहाजों, सुरक्षात्मक गियर और चिकित्सा क्षेत्र के लिए नए जैव-प्रेरित पदार्थों को डिजाइन करने में मदद कर सकती है, बल्कि अल्जाइमर जैसे न्यूरोलॉजिकल विकारों को समझने में भी नई अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

किंग्स कॉलेज लंदन और सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी (एसडीएसयू) के वैज्ञानिकों द्वारा प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित यह अध्ययन उन मौलिक सिद्धांतों को रेखांकित करता है, जो अगली पीढ़ी के उच्च-प्रदर्शन और पर्यावरण के अनुकूल फाइबर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शोध पहली बार यह बताता है कि मकड़ी के रेशम के प्रोटीन के भीतर अमीनो एसिड कैसे आणविक स्टिकर की तरह काम करते हैं, जो रेशम बनते समय सामग्री को आपस में जोड़े रखते हैं। किंग्स कॉलेज लंदन में कम्प्यूटेशनल मैटेरियल्स साइंस के प्रोफेसर क्रिस लोरेंज़ ने कहा कि इसके अनुप्रयोग बहुत व्यापक हैं—हल्के सुरक्षात्मक कपड़े, हवाई जहाज के पुर्जे, बायोडिग्रेडेबल मेडिकल इंप्लांट और सॉफ्ट रोबोटिक्स में भी इन प्राकृतिक सिद्धांतों का लाभ उठाया जा सकता है।

देखें मकड़ी के शिकार का वीडियो

स्टील से भी मजबूत क्यों है मकड़ी का रेशम? मकड़ी का ड्रैगलाइन सिल्क अपने असाधारण प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। वजन के आधार पर तुलना करें तो यह स्टील से अधिक मजबूत और बुलेट-प्रूफ जैकेट में इस्तेमाल होने वाले के्वलर से भी सख्त होता है। मकड़ी के रेशम ग्रंथि के भीतर ये प्रोटीन सिल्क डोप नामक गाढ़े तरल के रूप में जमा होते हैं, जिसे बाद में ठोस फाइबर में बदल दिया जाता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि आर्जिनिन और टायरोसिन नामक दो अमीनो एसिड एक विशिष्ट तरीके से परस्पर क्रिया करते हैं, जिससे रेशम के प्रोटीन शुरुआती चरणों में ही इकट्ठा होने लगते हैं। ये क्रियाएं फाइबर बनने के बाद भी सक्रिय रहती हैं, जिससे इसे बेजोड़ मजबूती मिलती है।

मस्तिष्क विज्ञान और अल्जाइमर से जुड़ाव शोध में एक चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब वैज्ञानिकों ने पाया कि यही आणविक तंत्र मानव मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर रिसेप्टर्स और हार्मोन सिग्नलिंग में भी उपयोग किया जाता है। प्रोफेसर ग्रेगरी हॉलैंड के अनुसार, जिस तरह से रेशम के प्रोटीन अपनी अवस्था बदलते हैं, वह अल्जाइमर जैसी बीमारियों में देखी जाने वाली प्रक्रियाओं के समान है। मकड़ी के रेशम का अध्ययन हमें यह समझने के लिए एक स्वच्छ और विकसित प्रणाली प्रदान करता है कि इन प्रक्रियाओं को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है, जो भविष्य में दिमागी बीमारियों के इलाज में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।

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