एरियोजना स्टेट यूनिवर्सिटी का मिट्टी पर नया प्रयोग सफल रहा
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सेनेगल के किसानों के साथ सफल परीक्षण
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डोनट डाइट: टिड्डियों के व्यवहार का रहस्य
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जैविक खाद के उपयोग से भी लाभ नजर आया
राष्ट्रीय खबर
रांचीः टिड्डियों के बारे में एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी की ग्लोबल लोकस्ट इनिशिएटिव की प्रमुख एरियान सीज़ कहती हैं, जब ये झुंड में होते हैं तो बहुत विनाशकारी होते हैं, लेकिन अकेले में ये काफी दिलचस्प जीव हैं। सीज़ टिड्डियों के व्यवहार और उनके विनाशकारी झुंडों को नियंत्रित करने के तरीकों पर शोध करती हैं। उनका काम न केवल फसलों को बचाना है, बल्कि इन कीटों के प्रति एक वैज्ञानिक सम्मान भी पैदा करना है।
आज भी टिड्डियों के झुंड दुनिया भर में फसलों को तबाह कर रहे हैं, जिससे आजीविका और बच्चों के भविष्य पर संकट मंडराता है। एक अकेला झुंड न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहर के आकार के बराबर यानी सैकड़ों वर्ग मील में फैला हो सकता है। इसी खतरे को देखते हुए, सीज़ और उनकी अंतरराष्ट्रीय टीम ने मिट्टी आधारित एक सरल तरीका खोज निकाला है जो टिड्डियों के आतंक को काफी कम कर सकता है।
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https://youtu.be/kYl95RczAjY
शोधकर्ताओं ने सेनेगल के किसानों के साथ मिलकर काम किया, जहाँ सेनेगल ग्रासहॉपर का प्रकोप रहता है। परीक्षण के दौरान किसानों ने बाजरे के दो प्लॉट लगाए—एक में नाइट्रोजन उर्वरक का उपयोग किया गया और दूसरे को बिना उर्वरक के छोड़ दिया गया। परिणाम चौंकाने वाले थे: उर्वरक वाले खेतों में टिड्डियों की संख्या कम थी, फसलों को नुकसान कम हुआ और पैदावार दोगुनी रही।
15 वर्षों के शोध के बाद सीज़ ने पाया कि पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी में उगने वाली फसलों में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक और प्रोटीन की कमी होती है। इसे वे डोनट डाइट कहती हैं, जो टिड्डियों के झुंड बनाने के लिए सबसे अनुकूल है। लंबी दूरी तय करने वाले एथलीटों की तरह, टिड्डियों को भी ऊर्जा के लिए भारी मात्रा में कार्ब्स की जरूरत होती है। इसके विपरीत, नाइट्रोजन युक्त मिट्टी में उगने वाले पौधों में प्रोटीन अधिक होता है, जिसे पचाना टिड्डियों के लिए कठिन होता है और उनकी ऊर्जा कम हो जाती है।
हालाँकि अध्ययन में नाइट्रोजन उर्वरक का उपयोग किया गया, लेकिन गरीब किसानों के लिए यह महंगा हो सकता है। इसलिए अब शोध का ध्यान पूरी तरह से जैविक खाद (कंपोस्ट) पर है, जिसके परिणाम भी समान रूप से सकारात्मक आ रहे हैं। सेनेगल के किसानों ने अब फसल के अवशेषों को जलाने के बजाय खाद बनाना शुरू कर दिया है, जिससे टिड्डियों का संक्रमण कम हुआ है।
यह शोध न केवल अफ्रीका के लिए बल्कि अमेरिका जैसे देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जहाँ जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में टिड्डियों का खतरा बढ़ सकता है। यह अध्ययन साबित करता है कि मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार कर हम बिना रसायनों के इन विनाशकारी कीटों से अपनी फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं।
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