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डॉलर की साख पर संकट से विश्व बाजार में हलचल

बैंक ऑफ अमेरिका की रिपोर्ट और ऐतिहासिक गिरावट

लंदन: वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर के लिए पिछला कुछ समय बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। पिछले कुछ घंटों के भीतर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर की कीमतों में आई भारी गिरावट ने दुनिया भर के निवेशकों और केंद्रीय बैंकों की रातों की नींद उड़ा दी है।

बैंक ऑफ अमेरिका की हालिया रिपोर्ट ने इस संकट को और अधिक स्पष्ट करते हुए डॉलर के प्रभुत्व पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, डॉलर में इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की वर्तमान मौद्रिक नीतियां मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़ों और आर्थिक सुस्ती के संकेतों के बीच, बाजार यह अनुमान लगा रहा है कि फेडरल रिजर्व आने वाले समय में ब्याज दरों में और अधिक कटौती कर सकता है।

इस आशंका ने डॉलर इंडेक्स को 97-98 के स्तर तक धकेल दिया है, जो पिछले कई महीनों का सबसे निचला स्तर है। जैसे ही डॉलर कमजोर हुआ, यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी अन्य वैश्विक मुद्राओं में जोरदार उछाल देखा गया, जिससे वैश्विक व्यापार संतुलन के बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है।

वॉल स्ट्रीट के खुलते ही तकनीकी और वित्तीय क्षेत्रों में भारी अफरा-तफरी का माहौल देखा गया। डॉलर की कमजोरी का मतलब है कि अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशों से कच्चे माल का आयात महंगा होगा। अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह गिरावट जारी रही, तो अमेरिका में मुद्रास्फीति का एक नया दौर शुरू हो सकता है, जो आम जनता की क्रय शक्ति को सीधे प्रभावित करेगा।

विकासशील देशों (जैसे भारत, ब्राजील) के लिए यह स्थिति एक ‘दोधारी तलवार’ की तरह है। एक ओर, इन देशों के लिए डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज का भुगतान सस्ता हो जाएगा, जो इनकी अर्थव्यवस्था के लिए राहत की बात है। लेकिन दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनके निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है क्योंकि उनकी घरेलू मुद्राएं डॉलर के मुकाबले महंगी हो रही हैं।

निवेशकों ने इस अनिश्चितता के बीच सुरक्षित संपत्तियों का रुख किया है। सोने की कीमतों में 5,500 डॉलर प्रति औंस के करीब नया रिकॉर्ड स्तर देखा जा रहा है। बिटकॉइन और अन्य डिजिटल संपत्तियों में निवेश का प्रवाह बढ़ा है, क्योंकि लोग पारंपरिक मुद्रा से हटकर विकल्प तलाश रहे हैं।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिकी सरकार ने तुरंत कोई बड़ा राजकोषीय प्रोत्साहन या नीतिगत सुधार नहीं किए, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है। अगले 24 घंटे वैश्विक बाजार के लिए निर्णायक साबित होंगे, क्योंकि सभी की नजरें फेडरल रिजर्व के अधिकारियों द्वारा जारी किए जाने वाले बयानों पर टिकी हैं।