भारत-अमेरिका व्यापार समझौता स्पष्टता का अभाव
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए हालिया व्यापार समझौते की खबर ने भारतीय उद्योग जगत में राहत की एक लहर दौड़ा दी है। हालांकि, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के प्रेस वक्तव्य के बावजूद, कई ऐसे महत्वपूर्ण और बुनियादी सवाल हैं जो अभी भी अनुत्तरित बने हुए हैं। यह समझौता न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि कूटनीतिक प्रोटोकॉल के लिहाज से भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
इस समझौते की शुरुआती घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चिर-परिचित अंदाज में सोशल मीडिया के माध्यम से की। भारत के परिप्रेक्ष्य में यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अब तक जितने भी प्रमुख व्यापारिक समझौते हुए हैं, उनकी घोषणा हमेशा औपचारिक और आधिकारिक माध्यमों से ही की गई है।
इस बार वाशिंगटन से आई इस अचानक घोषणा ने कूटनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बिंदु भारतीय आयातों पर अमेरिकी टैरिफ (शुल्क) में कटौती का है। मौजूदा 50 प्रतिशत के भारी-भरकम शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने का निर्णय निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन सवाल इसकी समय-सीमा को लेकर है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने जहां इसे तत्काल प्रभावी करने की बात कही है, वहीं पीयूष गोयल ने कहा है कि विवरण जल्द साझा किए जाएंगे। यह विरोधाभास क्रियान्वयन की निश्चित तारीख पर संशय पैदा करता है। विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर भी स्पष्टता नहीं है कि क्या यह समझौता एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते की पहली किश्त है, या यह केवल टैरिफ तक सीमित एक मिनी-डील है।
यदि यह एक व्यापक समझौते की शुरुआत है, तो इसके दायरे में सेवा क्षेत्र, बौद्धिक संपदा अधिकार और डिजिटल व्यापार जैसे मुद्दे भी शामिल होने चाहिए, जिन पर फिलहाल चुप्पी छाई हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप का वह दावा है, जिसमें उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमत हो गए हैं।
भारत सरकार ने अब तक इस दावे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। वाणिज्य मंत्री गोयल ने भी अपने बयान में इस विषय को नहीं छुआ। भारत के लिए रूसी तेल का आयात बंद करना एक अत्यंत कठिन और रणनीतिक रूप से जोखिम भरा कदम हो सकता है। वर्तमान में भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रूस से आयात करता है।
यदि भारत इस आपूर्ति को पूरी तरह बंद करता है, तो उसे तत्काल वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी, जिससे घरेलू बाजार में ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, रूस भारत का पुराना और भरोसेमंद मित्र रहा है, जो रक्षा उपकरणों का सबसे महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है। रूसी तेल से मुंह मोड़ना भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों पर छाया डाल सकता है।
यह कदम भारत की गुटनिरपेक्ष और स्वतंत्र विदेश नीति में एक निश्चित झुकाव का संकेत होगा। ऐसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक निर्णय पर सरकार को संसद में चर्चा करनी चाहिए और देश को विश्वास में लेना चाहिए। इसके विकल्प के रूप में वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने की बात भी कही जा रही है, लेकिन वेनेजुएलाई तेल की शोधन प्रक्रिया जटिल है और भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह एक तकनीकी चुनौती साबित हो सकती है। व्यापारिक सौदों में हमेशा कुछ लो और कुछ दो की स्थिति होती है।
सवाल यह है कि इस 32 फीसद टैरिफ कटौती के बदले भारत ने अमेरिका को क्या वचन दिया है? सरकार ने केवल इतना आश्वासन दिया है कि संवेदनशील कृषि उत्पादों और डेयरी क्षेत्र को इस समझौते से बाहर रखा गया है, लेकिन अन्य रियायतों पर अभी भी पर्दा पड़ा हुआ है। भारतीय निर्यातकों के लिए यह साल दोहरी खुशी लेकर आया है।
एक तरफ अमेरिका के साथ टैरिफ कटौती की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता भी इसी साल लागू होने की संभावना है। हालांकि, अमेरिका में भारतीय उत्पादों को अभी भी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (जैसे वियतनाम या थाईलैंड) की तुलना में थोड़े उच्च शुल्क का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि उन देशों को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा प्राप्त है।
तथापि, केंद्रीय बजट 2026 में की गई लक्षित घोषणाएं इस अंतर को कम करने में मदद करेंगी। यदि भारत अपनी विनिर्माण लागत को कम करने और गुणवत्ता में सुधार करने में सफल रहता है, तो यह नया व्यापारिक समीकरण वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को बहुत मजबूत बना सकता है। अंततः, इस समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार घरेलू हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक संतुलन कैसे बनाए रखती है। फिर भी यह सवाल प्रासंगिक बना हुआ है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद के युद्धविराम से लेकर इस व्यापार समझौते का एलान हर बार दिल्ली के बदले वाशिंगटन से आखिर क्यों हो रहा है।