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Sukma News: सुकमा के गोगुंडा में माओवादी लीडर रमन्ना का स्मारक ध्वस्त, बस्तर में कमजोर होता नक्सलवाद का गढ़

सुकमा: 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद की जड़ें बस्तर से उखाड़कर फेंकने के लिए जवान दिन रात जंगलों की खाक छान रहे हैं. इसी कड़ी में आज गोगुंडा के जंगल में बने माओवादी लीडर रमन्ना का स्मारक जवानों ने जमींदोज कर दिया. जिस तेजी के साथ नक्सलवाद का खात्मा बस्तर में हो रहा है उससे उम्मीद है कि जल्द ही बस्तर अपने तय समय सीमा के भीतर नक्सल मुक्त संभाग बन जाएगा.

माओवादी लीडर रमन्ना का स्मारक जवानों ने जमींदोज कर दिया

दरअसल, सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के जवान कमांडेंट हिमांशु पांडे के निर्देश पर एंटी नक्सल ऑपरेशन के लिए जंगलों में निकले. सर्चिंग के दौरान जवानों को जंगल में एक नक्सली स्मारक नजर आया. जवानों ने पास जाकर देखा तो पाया कि वहां पर मारे गए नक्सली का स्मारक माओवादियों ने उसकी याद में बना रखा है.

दहशत का प्रतीक था स्मारक

जिस स्मारक को ध्वस्त किया गया, वह किसी सामान्य व्यक्ति का नहीं था. यह स्मारक था कुख्यात माओवादी नेता रमन्ना का जिसका नाम कभी तेलंगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में खौफ का दूसरा नाम माना जाता था. तेलंगाना के वारंगल का रहने वाला रमन्ना माओवादियों की सेंट्रल कमेटी का सचिव रहा था. उस पर तीन राज्यों में कुल मिलाकर करीब 2.40 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था.

रमन्ना की पहचान केवल एक नाम तक सीमित नहीं थी, वह कई बड़े नक्सली षड्यंत्रों और हमलों की रणनीतियों से जुड़ा रहा था. दिसंबर 2019 में उसकी मृत्यु की खबर आई, लेकिन उसकी विचारधारा और नेटवर्क का असर लंबे समय तक महसूस किया गया. इसी प्रभाव को बनाए रखने के लिए संगठन ने ऐसे स्मारकों को शहादत के प्रतीक के रूप में खड़ा किया ताकि डर जिंदा रहे, और असर कायम रहे.

नक्सली स्मारक: रणनीति का हिस्सा

सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि नक्सली स्मारक भावनात्मक श्रद्धांजलि भर नहीं होते. इनके पीछे गहरी मनोवैज्ञानिक रणनीति होती है, ग्रामीणों के मन में भय बैठाना, संगठन की ताकत का प्रदर्शन, नई पीढ़ी को वैचारिक रूप से प्रभावित करना, हिंसा को शहादत के रूप में पेश करना. इसी मानसिक कब्जे को तोड़ना इस कार्रवाई का मूल उद्देश्य था.

रणनीतिक कार्रवाई: हर कदम सतर्क

स्मारक ध्वस्तीकरण से पहले पूरे इलाके की गहन सर्चिंग की गई. संभावित खतरे को देखते हुए सुरक्षा घेरा मजबूत किया गया. चारों दिशाओं से मोर्चा संभाला गया ताकि किसी भी तरह की माओवादी प्रतिक्रिया को तुरंत निष्क्रिय किया जा सके. जब स्मारक पर पहला प्रहार हुआ, वह सिर्फ सीमेंट पर नहीं था वह माओवाद की मानसिक पकड़ पर सीधा वार था. कुछ ही मिनटों में चार दशक पुराना भय मलबे में बदल गया. पत्थरों की गिरती आवाज़ के साथ वहां मौजूद ग्रामीणों की आंखों में राहत साफ दिखाई दी. वर्षों से जमा खामोशी जैसे टूट रही थी. एक बुजुर्ग ग्रामीण की आंखें नम थी. बुजुर्ग ने चंद शब्दों में कहा, कई सालों से हम इसे देख रहे थे, हमेशा डर लगा रहता था. आज पहली बार लग रहा है कि हम सच में आज़ाद हैं.

टूट रहा नक्सलवाद का झूठा तिलिस्म

CRPF 74 वाहिनी के असिस्टेंट कमांडेंट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, माओवाद केवल हथियारों से नहीं लड़ता, वह प्रतीकों और डर के जरिए लोगों के दिमाग पर कब्जा करता है. ऐसे अवैध स्मारकों को हटाना जरूरी है, ताकि भय की जड़ पूरी तरह खत्म हो और विकास का रास्ता खुले. यह बयान बताता है कि सुरक्षा बलों की लड़ाई अब सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं, बल्कि विचारधाराओं के खिलाफ भी है. स्मारक हटते ही गांव का माहौल बदला हुआ दिखा. विशेषज्ञ मानते हैं कि डर के प्रतीक हटते ही विकास जमीन पर उतरता है. अब यहां सड़क और संचार सुविधाओं का विस्तार, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का तेजी से होगा.