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किराए का मकान या अपना घर? रियल एस्टेट का यह ‘1% फॉर्मूला’ पल भर में दूर कर देगा आपकी कन्फ्यूजन, जानें आपके लिए क्या है फायदे का सौदा

हर व्यक्ति के जीवन में एक समय ऐसा जरूर आता है जब वह एक बड़े धर्मसंकट में फंस जाता है- ताउम्र किराए के मकान में रहकर मकान मालिक की जेब भरते रहें या फिर बैंक से भारी-भरकम लोन लेकर अपने सपनों का घर खरीद लें? यह फैसला इतना आसान नहीं होता, क्योंकि इसमें आपकी जीवनभर की कमाई दांव पर लगी होती है. अगर आप भी इसी कश्मकश में हैं, तो रियल एस्टेट की दुनिया का एक फेमस’1% नियम’ (1% Rule) आपकी मदद कर सकता है. यह नियम न केवल आपको निवेश की सही दिशा दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कोई प्रॉपर्टी आर्थिक रूप से आपके लिए फायदेमंद है भी या नहीं.

क्या है यह 1% का नियम?

रियल एस्टेट निवेश की दुनिया में ‘1% रेंट वर्सेस बाय रूल’ एक बेहद सरल पैमाना है. यह नियम कहता है कि अगर आप कोई घर निवेश के मकसद से खरीद रहे हैं, तो उससे मिलने वाला मासिक किराया उस घर की कुल कीमत का कम से कम 1% होना चाहिए.

उदाहरण के लिए, अगर आप 1 करोड़ रुपये का फ्लैट खरीद रहे हैं, तो उसका मासिक किराया 1 लाख रुपये के आसपास होना चाहिए. अगर किराया इससे काफी कम है, तो निवेश के लिहाज से प्रॉपर्टी खरीदना घाटे का सौदा हो सकता है. इसे चेक करने का फॉर्मूला बेहद आसान है: (मासिक किराया ÷ प्रॉपर्टी की कीमत) × 100. अगर नतीजा 1 के आसपास है, तो सौदा अच्छा माना जाता है. हालांकि, इसमें आपको मेंटेनेंस, टैक्स और लोन के ब्याज जैसे खर्चों को भी जोड़कर देखना चाहिए.

क्या भारत में लागू होता है यह फॉर्मूला?

यह सुनने में जितना आसान लगता है, भारतीय बाजार में इसकी हकीकत थोड़ी अलग है. कोलियर्स इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर (रेसिडेंशियल सर्विसेज) रवि शंकर सिंह के मुताबिक, यह नियम अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों के लिए तो सटीक बैठता है, लेकिन भारत में इसे ज्यों का त्यों लागू नहीं किया जा सकता.

पश्चिमी देशों में रेंटल यील्ड (किराए से कमाई) और ब्याज दरों में बहुत कम अंतर होता है, जबकि भारत में स्थिति अलग है. भारत में रिहायशी प्रॉपर्टी पर रेंटल यील्ड आमतौर पर 2% से 4% के बीच होती है, जो कि 1% नियम के हिसाब से बहुत कम है. इसलिए, भारत में यह नियम पुराने घर को खरीदकर, उसे रेनोवेट करके किराए पर देने की स्थिति में तो कुछ हद तक काम कर सकता है, लेकिन सामान्य घर खरीद में यह नियम पूरी तरह फिट नहीं बैठता. मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे महानगरों में प्रॉपर्टी की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन उस अनुपात में किराया नहीं बढ़ा है.

किराया या EMI, फैसला लेते समय इन बातों का रखें ध्यान

सिर्फ गणित के फॉर्मूले से जीवन के फैसले नहीं लिए जाते. घर खरीदने और किराए पर रहने के बीच चुनाव करते समय आपको अपनी निजी जरूरतों को भी तराजू में तौलना होगा.

  1. एसेट क्रिएशन बनाम फ्लेक्सिबिलिटी: जब आप घर खरीदते हैं, तो आप एक ‘एसेट’ बना रहे होते हैं. लंबी अवधि में प्रॉपर्टी के दाम 5-7% सालाना की दर से बढ़ते हैं, जिससे आपकी दौलत में इजाफा होता है. वहीं, किराए पर रहने से आपको जगह बदलने की आजादी (Flexibility) मिलती है, जो नौकरी बदलने वालों के लिए फायदेमंद है.
  2. भावनात्मक सुरक्षा: अपना घर होने का मतलब सिर्फ ईंट-गारे की छत नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक है. किराए के घर में यह अपनापन और स्थायित्व नहीं मिल पाता.
  3. लंबी अवधि का नजरिया: विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आप किसी शहर में 5 साल या उससे अधिक समय तक रहने का प्लान कर रहे हैं, तो घर खरीदना समझदारी है. लेकिन अगर आपका करियर आपको अलग-अलग शहरों में ले जाता है, तो भारी-भरकम EMI के बोझ से बचना ही बेहतर है.