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राघव चड्डा ने हड़तालियों का समर्थन में बयान दिया

क्विक कॉमर्स और डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स की आलोचना

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भारत में तेजी से उभरते क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स के कार्य करने के तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इन कंपनियों के बिजनेस मॉडल की तीखी आलोचना करते हुए इसे शोषणकारी करार दिया है।

चड्ढा की यह विस्तृत प्रतिक्रिया दरअसल जोमैटो और ब्लिंकिट के संस्थापक दीपिंदर गोयल के उस सोशल मीडिया पोस्ट के बाद आई है, जिसमें गोयल ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल कर रहे डिलीवरी पार्टनर्स को शरारती तत्व के रूप में संबोधित किया था। गोयल का तर्क था कि ये कंपनियां बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा कर रही हैं और कुछ लोग व्यवस्था में बाधा डाल रहे हैं।

राघव चड्ढा ने गोयल के इस बयान को आड़े हाथों लेते हुए एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक अत्यंत कड़ा संदेश साझा किया। उन्होंने लिखा कि देशभर में डिलीवरी पार्टनर्स अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे—सम्मानजनक व्यवहार, उचित मेहनताना, कार्यस्थल पर सुरक्षा, भविष्य के लिए सामाजिक सुरक्षा और स्पष्ट कार्य नियमों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं।

चड्ढा के अनुसार, जब कोई कंपनी अपने श्रमिकों की जायज मांगों को सुनने के बजाय उन्हें अपराधी या शरारती करार देती है और एक सीधे श्रम विवाद को कानून-व्यवस्था की समस्या बताकर पुलिस का सहारा लेती है, तो यह न केवल उन श्रमिकों का अपमान है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक भी है।

सांसद ने तंज कसते हुए कहा कि यदि किसी सिस्टम को चलाने के लिए आपको बल प्रयोग या पुलिस की निगरानी की आवश्यकता पड़ रही है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि आपका बनाया हुआ ढांचा पूरी तरह विफल हो चुका है। उन्होंने एक बेहद प्रभावशाली टिप्पणी करते हुए कहा, अगर आपको अपने कर्मचारियों को सड़क पर काम करने के लिए मजबूर करने हेतु पुलिस बुलानी पड़ती है, तो वे आपके कर्मचारी नहीं रह जाते; वे हेलमेट पहने हुए बंधक बन जाते हैं।

चड्ढा ने आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था और गिग-वर्कर्स के अधिकारों पर जोर देते हुए कहा कि इन कंपनियों का भारी-भरकम राजस्व उन युवाओं की मेहनत पर टिका है जो चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश में भी समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने कंपनियों को नसीहत दी कि वे केवल अपने मुनाफे और निवेशकों की खुशी पर ध्यान न दें, बल्कि उन लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक भविष्य की भी चिंता करें जो इस तंत्र की असली रीढ़ हैं। अंत में, उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि गिग-वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा के लिए जल्द से जल्द कड़े नियम और कानून बनाए जाएं ताकि कॉर्पोरेट मनमानी पर लगाम लग सके।