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तमिलनाडु से तीन नाबालिग बच्चियों को बचाया गया

असम पुलिस ने मानव तस्करी रैकेट को दबोचा

  • अपहरण से रेस्क्यू तक का सफर

  • लालच के साथ शोषण का जाल

  • कोयंबटुर में छापा मारा गया था

राष्ट्रीय खबर

चेन्नईः असम पुलिस ने अंतरराज्यीय मानव तस्करी के एक बड़े नेटवर्क को ध्वस्त करते हुए तमिलनाडु के कोयंबटूर से तीन नाबालिग लड़कियों को सुरक्षित छुड़ाने में सफलता हासिल की है। इस साहसिक ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने तस्करी के आरोप में सिल्चर निवासी सबिता दास को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई पुलिस की मुस्तैदी और तकनीकी जांच का परिणाम है, जिसने हजारों किलोमीटर दूर बंधक बनाई गई बच्चियों को फिर से उनके परिवार से मिला दिया।

मामले की शुरुआत 15 दिसंबर को हुई, जब मोरीगांव जिले के जागीरोड स्थित बिहिता गांव से दो नाबालिग लड़कियां रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गई थीं। परिजनों की शिकायत पर जागीरोड पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज कर जांच शुरू की। मोबाइल लोकेशन और खुफिया सूचनाओं के आधार पर पुलिस को पता चला कि लड़कियों को चेन्नई ले जाया गया है।

महिला पुलिस अधिकारी मुन सैकिया के नेतृत्व में असम पुलिस की एक विशेष टीम तुरंत तमिलनाडु रवाना हुई। स्थानीय पुलिस के सहयोग से कोयंबटूर के तिरुप्पुर इलाके में एक संदिग्ध ठिकाने पर छापा मारा गया। वहां न केवल जागीरोड की दो लड़कियां मिलीं, बल्कि नगांव जिले के बरहमपुर की एक अन्य नाबालिग को भी मुक्त कराया गया, जिसे वहां बंधक बनाकर रखा गया था।

पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि आरोपी महिला, सबिता दास, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की कम उम्र की लड़कियों को अपना निशाना बनाती थी। वह उन्हें महानगरों में अच्छी नौकरी और बेहतर जीवन का झांसा देकर ले जाती थी और फिर उन्हें अनैतिक गतिविधियों के दलदल में धकेल देती थी। पुलिस अब इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश कर रही है ताकि इस गिरोह की जड़ों को पूरी तरह काटा जा सके।

इस बचाव अभियान के साथ ही असम के मोरीगांव जिले ने बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में न्याय दिलाने के मामले में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, मोरीगांव जिला असम में पॉक्सो मामलों में सबसे अधिक सजा दिलाने वाला जिला बनकर उभरा है।

जिले में दर्ज कुल 128 मामलों में से 120 में पुलिस ने रिकॉर्ड समय में चार्जशीट दाखिल की। त्वरित जांच और मजबूत पैरवी का ही नतीजा है कि 65 अपराधियों को अदालत ने कड़ी सजा सुनाई है। अधिकारियों का कहना है कि पुलिस थानों के प्रभारी और जांच अधिकारियों की प्राथमिकता के कारण ही लगभग 70 प्रतिशत मामलों का ट्रायल शुरू हो सका और पीड़ितों को त्वरित न्याय मिल पाया।