अरावली: विकास की वेदी पर बलि चढ़ती पारिस्थितिकी
अरावली पर्वतमाला, जो दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। गुजरात से दिल्ली तक फैली यह श्रृंखला केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिक जीवन रेखा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिसे रेगिस्तान के विस्तार को रोकने वाली दीवार होना चाहिए था, उसे आज खनन माफियाओं और पूंजीपतियों के मुनाफे की खदान बना दिया गया है।
केंद्र सरकार का रवैया और नीतिगत बदलाव इस विनाश की प्रक्रिया में मूकदर्शक या कई बार सहायक की भूमिका में नजर आते हैं। अरावली में खनन का इतिहास अदालती आदेशों और उनके उल्लंघन का इतिहास रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2002 और उसके बाद कई बार स्पष्ट किया कि अरावली के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन नहीं होना चाहिए।
इसके बावजूद, राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली खनन की अनुमति और लीगल माइनिंग की आड़ में चलने वाला अवैध खेल बदस्तूर जारी है। विकास की भूख ने अरावली की पहाड़ियों को समतल मैदानों में तब्दील कर दिया है। कैग की रिपोर्टों और कई पर्यावरण संगठनों ने समय-समय पर आगाह किया है कि अरावली की कई पहाड़ियां मानचित्र से पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।
यह केवल पहाड़ों का गायब होना नहीं है, बल्कि उस प्राकृतिक अवरोध का अंत है जो थार मरुस्थल को दिल्ली और हरियाणा की ओर बढ़ने से रोकता है। केंद्र सरकार के हालिया नीतिगत फैसले पर्यावरणविदों के बीच चिंता का विषय बने हुए हैं। वन संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023 इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। इस संशोधन के माध्यम से वन की परिभाषा को जिस तरह से सीमित किया गया है, उससे अरावली का एक बड़ा हिस्सा डीम्ड फॉरेस्ट की श्रेणी से बाहर होने का खतरा पैदा हो गया है।
जब कोई क्षेत्र आधिकारिक रूप से वन नहीं रहता, तो वहां पूंजीपतियों के लिए रिसॉर्ट्स, रियल एस्टेट और खनन परियोजनाओं के रास्ते खुल जाते हैं। सरकार का तर्क है कि ये बदलाव ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और रणनीतिक परियोजनाओं के लिए आवश्यक हैं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की कीमत उस ईज ऑफ लिविंग से बड़ी है, जो हमें शुद्ध हवा और पानी के रूप में मिलती है?
अरावली उत्तर भारत के लिए एक बड़े कार्बन सिंक और ग्राउंड वाटर रिचार्ज जोन का काम करती है। इसे कमजोर करना करोड़ों लोगों के भविष्य को खतरे में डालना है। अरावली के विनाश में सबसे बड़ी भूमिका उस गठजोड़ की है जिसे अक्सर क्रोनी कैपिटलिज्म कहा जाता है। रियल एस्टेट और माइनिंग सेक्टर के बड़े कॉरपोरेट घरानों का राजनीति पर प्रभाव किसी से छिपा नहीं है।
अरावली की गोद में बने आलीशान फार्महाउस, गोल्फ कोर्स और अवैध कॉलोनियां इस बात का प्रमाण हैं कि नियम केवल आम आदमी के लिए होते हैं, रसूखदारों के लिए नहीं। पूंजीपतियों के प्रति झुकाव का आलम यह है कि पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रियाओं को अक्सर महज एक औपचारिकता बना दिया जाता है। बड़ी कंपनियां अपनी वित्तीय शक्ति के बल पर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास करती हैं।
जब मुनाफे की तुलना पर्यावरण से की जाती है, तो अक्सर सत्ता का पलड़ा पूंजी की ओर ही झुकता नजर आता है। अरावली का विनाश केवल स्थानीय समस्या नहीं है। इसके परिणाम भयावह हैं। अरावली की पहाड़ियां वर्षा जल को जमीन के नीचे ले जाने का काम करती हैं। इनके नष्ट होने से गुरुग्राम, फरीदाबाद और दिल्ली में भूजल का संकट चरम पर पहुँच गया है। धूल के कण जो खनन और क्रशरों से निकलते हैं, दिल्ली-एनसीआर की हवा को और अधिक घातक बना रहे हैं।
जैव विविधता का अंत: यह पर्वतमाला तेंदुओं, धारीदार लकड़बग्घों और पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों का घर है। उनके प्राकृतिक आवास छिनने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। अरावली का मुद्दा आज इस बात की परीक्षा है कि हम एक समाज और राष्ट्र के रूप में प्रकृति को क्या दर्जा देते हैं। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण के प्रति गंभीर है, तो उसे अरावली के संरक्षण के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी।
केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूंजीपतियों और खनन माफियाओं के प्रति सख्त रुख अपनाना अनिवार्य है। हमें यह समझना होगा कि पत्थर और कंक्रीट से बनी इमारतें हमें सुरक्षा दे सकती हैं, लेकिन वे हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और पीने के लिए पानी नहीं दे सकतीं। अरावली को बचाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि उत्तर भारत के अस्तित्व के लिए एक अनिवार्य शर्त है। वैसे मोदी सरकार पूंजीपतियों पर किस स्तर तक मेहरबान हो सकती है, इसका ताजा उदाहरण यह भी है।