Breaking News in Hindi

अरबपति व्यापारी आंद्रेज बाबिस ने संभाली कमान

चेक गणराज्य में अप्रत्याशित राजनीतिक बदलाव दिखा

प्रागः चेक गणराज्य की राजधानी प्राग की राजनीति में एक नाटकीय मोड़ आया है, जहाँ प्रभावशाली अरबपति व्यवसायी आंद्रेज बाबिस ने एक अस्थिर गठबंधन सरकार के गठन के बाद एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है। बाबिस की यह वापसी मध्य यूरोपीय राष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ती है, खासकर इसलिए क्योंकि उनका पिछला कार्यकाल भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और निरंतर राजनीतिक अस्थिरता के चलते समाप्त हो गया था।

बाबिस के नेतृत्व वाली केंद्रवादी पार्टी, एएनओ, ने हाल ही में हुए संसदीय चुनावों में सबसे अधिक वोट और सीटें जीती थीं, जिससे वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालाँकि, पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल करने में निर्णायक रूप से विफल रही। इस कारण, बाबिस को सत्ता में लौटने के लिए एक छोटे और अपेक्षाकृत कमज़ोर सहयोगी दल के साथ जटिल गठबंधन समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसने उनकी नई सरकार को शुरू से ही नाजुक बना दिया है।

बाबिस को उनके लोकलुभावन राजनीतिक अंदाज़ और व्यापारिक पृष्ठभूमि के कारण अक्सर पश्चिम में “चेक ट्रम्प” उपनाम से पुकारा जाता है। उनका राजनीतिक मंच मुख्य रूप से यूरोपीय संघ के आलोचकों को लुभाने और चेक गणराज्य के राष्ट्रीय हितों की संप्रभु रक्षा पर केंद्रित है। उनकी इस वापसी से ब्रुसेल्स (यूरोपीय संघ का मुख्यालय) और प्राग के बीच कूटनीतिक और राजनीतिक तनाव बढ़ने की प्रबल संभावना है। यह तनाव विशेष रूप से विवादास्पद प्रवासन नीतियों और यूरोपीय संघ के विशाल बजट में राष्ट्रीय योगदान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केंद्रित हो सकता है।

हालांकि, उनके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग दृढ़ता से मानता है कि एक सफल व्यवसायी और प्रबंधन विशेषज्ञ के रूप में, बाबिस के पास देश की अर्थव्यवस्था को तेज़ी से गति देने और धीमी गति वाली नौकरशाही की प्रक्रियाओं को कम करने की आवश्यक क्षमता और अनुभव है।

दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने सत्ता में उनके लौटने के तुरंत बाद ही बाबिस के खिलाफ लंबित भ्रष्टाचार के पुराने मामलों को फिर से खोलने की माँग करना शुरू कर दिया है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि उनकी नई सरकार को कानूनी जाँच और तीव्र राजनीतिक चुनौतियों का निरंतर सामना करना पड़ेगा। चेक गणराज्य में यह राजनीतिक विकास स्पष्ट रूप से यूरोपीय संघ के भीतर लोकलुभावन ताकतों और राष्ट्रवादी विचारधाराओं के बढ़ते, प्रभावी प्रभाव को भी दर्शाता है।