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अमेरिकी वहिष्कार के बाद भी जोहांसबर्ग में नये समीकरण

जी20 शिखर सम्मेलन से बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत

जोहांसबर्गः नवंबर 2025 में दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहान्सबर्ग में आयोजित होने वाला जी20 शिखर सम्मेलन एक बड़े कूटनीतिक विवाद से घिरा रहा, जिसका मुख्य कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का अंतिम समय में बहिष्कार करना रहा। इस शिखर सम्मेलन में दुनिया के 19 प्रमुख देश (जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और नीतियों को दिशा देते हैं) एकत्रित होने वाले थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी अनुपस्थिति का कारण दक्षिण अफ्रीका में श्वेत नागरिकों के कथित मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन को बताया। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों ने इस निर्णय को एक गहरे राजनीतिक स्वार्थ और बदलती वैश्विक राजनीति के संकेत के रूप में देखा है।

इस बहिष्कार को केवल मानवाधिकारों की चिंता तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह अमेरिका की एकाधिकारवादी विदेश नीति से वैश्विक बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ते बदलाव को दर्शाता है। चीन और रूस जैसी शक्तियों ने इस अवसर का उपयोग करते हुए ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया।

अमेरिकी बहिष्कार ने जी20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर पश्चिमी प्रभुत्व को कमजोर किया और मेजबान दक्षिण अफ्रीका के साथ अमेरिका के पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को और बिगाड़ दिया। दक्षिण अफ्रीका ने अमेरिकी विदेश विभाग के एक कनिष्ठ अधिकारी को समापन समारोह में शामिल करने की योजना पर भी आपत्ति जताई, जो इस कूटनीतिक शीतलता को दर्शाता है।

अमेरिकी बहिष्कार के बाद, दक्षिण अफ्रीका और अन्य ग्लोबल साउथ देशों ने एक अधिक समावेशी और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की मांग को मजबूती से उठाया। वहीं, यूक्रेन के सहयोगी देशों ने सम्मेलन के संयुक्त बयान में रूस की भूमिका को नामित न करने पर निराशा व्यक्त की, जो दर्शाता है कि जी20 जैसे मंचों पर अब यूक्रेन संघर्ष जैसे मुद्दों पर पश्चिमी सर्वसम्मति बनाए रखना मुश्किल हो गया है।

अमेरिका का यह कदम न केवल तात्कालिक रूप से मेजबान देश के लिए अपमानजनक था, बल्कि यह वैश्विक कूटनीति के लिए एक गंभीर संकेत है कि प्रमुख शक्तियां अब बहुपक्षीय सहयोग के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को पहले रख रही हैं। यह घटना वैश्विक व्यवस्था में एक नए और अनिश्चित दौर की शुरुआत का परिचायक है।