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गठबंधन की ढीली पड़ती गांठ

भारतीय राजनीति में गठबंधन और सहयोग का ताना-बाना जितना आवश्यक है, उतना ही यह विश्वासघात और कड़वाहट से भरा भी हो सकता है। हालिया घटनाक्रम में, झारखंड की सत्ताधारी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने बिहार विधानसभा चुनाव से अपना नाम वापस लेने का कड़ा फैसला लिया है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता इंडिया गठबंधन की नींव पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

झामुमो ने सीधे तौर पर अपने सहयोगी दलों, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस, पर राजनीतिक साजिश का शिकार बनाने का संगीन आरोप लगाया है। यह फैसला न सिर्फ बिहार के चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करेगा, बल्कि भविष्य में इन पार्टियों के आपसी संबंधों की दिशा भी तय करेगा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं के बयान इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं कि यह वापसी आकस्मिक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक छल का परिणाम है।

झामुमो नेता सुदिव्य कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से बताते हुए कहा कि 2020 के बिहार चुनाव के दौरान, RJD और कांग्रेस ने झामुमो को तीन सीटें देने का स्पष्ट आश्वासन दिया था। दुर्भाग्य से, वह वादा कभी पूरा नहीं किया गया, और झामुमो को अपमानित होना पड़ा। कुमार के शब्दों में, हमारे साथ धोखा हुआ।

इस धोखे की पृष्ठभूमि तब और भी अधिक चुभने वाली हो जाती है जब झारखंड के पिछले विधानसभा चुनावों में झामुमो की उदारता पर विचार किया जाता है। झामुमो ने तब कांग्रेस, RJD और वामपंथी दलों के लिए बड़ी संख्या में सीटें छोड़ी थीं, जिससे गठबंधन को राज्य में सत्ता हासिल करने में मदद मिली थी। यह एक स्पष्ट गिव एंड टेक की राजनीति थी, जहां झामुमो ने पहले सहयोगियों को समायोजित किया था।

लेकिन जब बिहार में झामुमो की बारी आई, तो उसे एक बार फिर अपमान का घूंट पीना पड़ा। यह एकतरफा बलिदान की राजनीति झामुमो को स्वीकार्य नहीं थी, और पार्टी ने इस अपमान का कड़ा और करारा जवाब देने की धमकी दी है। यह धमकी केवल बिहार तक ही सीमित नहीं हो सकती है; इसके दूरगामी परिणाम झारखंड की गठबंधन सरकार पर भी पड़ सकते हैं।

झामुमो ने इस राजनीतिक उपेक्षा का पहला जवाब शनिवार को दिया, जब पार्टी ने घोषणा की कि वह इंडिया गठबंधन के साथ जाने के बजाय बिहार में छह सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। पार्टी की केंद्रीय महासचिव और प्रवक्ता, सुप्रिया भट्टाचार्य ने एक बैठक में इस निर्णय की पुष्टि की।

छह सीटें थीं: चकाई, धमाका, कटोरिया (एसटी), मनिहारी (एसटी), जमुई और पीरपैंती (एससी)। ये सभी सीटें दूसरे चरण के मतदान (11 नवंबर) में शामिल थीं। भट्टाचार्य ने नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने एकला चलो नीति अपनाने का कारण स्पष्ट किया: गठबंधन ने झामुमो की मांग के अनुसार सीटें नहीं दीं।

झामुमो ने मूल रूप से बारह सीटों की मांग की थी, लेकिन कथित तौर पर उसे कोई सम्मानजनक संख्या नहीं दी गई। यह स्थिति साफ तौर पर दर्शाती है कि इंडिया गठबंधन के भीतर सम्मान और सीटों के उचित बंटवारे को लेकर गहरी दरार थी। हालाँकि, अब झामुमो ने इन छह सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के पहले के फैसले को भी बदलते हुए, पूर्ण रूप से चुनाव से नाम वापस ले लिया है।

यह कदम एकला चलो की रणनीति से भी एक कदम आगे बढ़कर पूर्ण बहिष्कार की रणनीति है, जो इस बात का प्रमाण है कि झामुमो के शीर्ष नेतृत्व ने महसूस किया कि इस साजिश का सबसे प्रभावी जवाब चुनावी मैदान से पूरी तरह बाहर हो जाना ही है। मूल रूप से, कांग्रेस और राजद के बीच सीटों को लेकर खींचतान चल रही थी, जिसने गठबंधन के अन्य छोटे सहयोगियों के लिए जगह कम कर दी।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता का नारा जमीन पर सीटों के व्यावहारिक बंटवारे के सामने अक्सर दम तोड़ देता है। झारखंड मुक्ति मोर्चा का बिहार विधानसभा चुनाव से नाम वापस लेना सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं है, बल्कि इंडिया गठबंधन के भीतर चल रही गहरी राजनीतिक दरारों और सहयोगी दलों के बीच विश्वास के संकट का प्रतीक है।

यह घटना विपक्षी एकता के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि यदि सीट बंटवारे और सम्मानजनक भागीदारी के मुद्दों को ठीक से नहीं सुलझाया गया, तो राष्ट्रीय स्तर पर एकता का सपना बिखर सकता है। इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीति में विश्वासघात की कीमत अक्सर गठबंधन की सफलता को चुकानी पड़ती है। अब झारखंड की सरकार में शामिल राजद और कांग्रेस के मंत्रियों पर इसका क्या असर पड़ता है, यह देखने लायक बात होगी क्योंकि झामुमो का बयान आने के बाद से ही सत्ता समीकरण दूसरी तरफ जाने की चर्चा भी तेज होने लगी है।