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केंद्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों को नया झूनझूना पकड़ा दिया

आठवें वेतन आयोग का लाभ तीन साल बाद

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को 8वें वेतन आयोग के लिए अभी लंबा इंतज़ार करना होगा। हर 10 साल में एक वेतन आयोग आता है। अभी सरकारी कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग के हिसाब से वेतन मिलता है। इसका गठन 2014 में यूपीए सरकार के दौरान हुआ था। हालाँकि, इसे 2016 में एनडीए सरकार ने लागू किया था। इससे लगभग 49 लाख सरकारी कर्मचारियों और लगभग 68 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा। उनके मूल वेतन में काफी हद तक संशोधन होगा। भत्ते भी बदलेंगे।

अब, सभी सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच एक बड़ा सवाल घूम रहा है: क्या 8वें वेतन आयोग का लाभ पाने के लिए हमें 2028 तक इंतज़ार करना होगा? लेकिन 2028 का मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है? इसकी एक वजह है। पिछला अनुभव कहता है कि किसी भी वेतन आयोग को लागू होने में आमतौर पर दो से तीन साल लगते हैं।

अगर ऐसा होता है, तो इस बार भी 2028 तक इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं होगा! छठे वेतन आयोग की तरह। पैनल का गठन 2006 में हुआ था। आयोग ने 2008 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस मामले को अगस्त 2008 में लागू किया जाना था। मतलब लगभग 22 से 24 महीने बाद।

सातवें वेतन आयोग का गठन फरवरी 2014 में हुआ था। इसे मार्च में अंतिम रूप दिया गया था। फिर आयोग ने नवंबर 2015 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। सरकार ने जून 2016 में इस मामले को अंतिम रूप दिया। इसके गठन से लेकर कार्यान्वयन तक लगभग 33 महीने (2 वर्ष और 9 महीने) लगे।

ऐसा लगता है कि पिछले दो वेतन आयोगों को लागू करने में औसतन लगभग 2-3 साल लगे। और आठवां वेतन आयोग? इस संबंध में पहली घोषणा 16 जनवरी, 2025 को हुई थी। आठवें वेतन आयोग के संदर्भ की शर्तें अभी तक अंतिम रूप नहीं दी गई हैं। परिणामस्वरूप, यह कहा जा सकता है कि आठवें वेतन आयोग ने अभी तक गति नहीं पकड़ी है तो फिर इन्हें लागू होने में 2028 लग सकते हैं!

कई लोगों को लगता है कि ऐसा सचमुच होगा। दूसरी तरफ नये वेतन आयोग से किसे क्या लाभ होगा, इस पर केंद्रीय कर्मचारियों का बड़ा वर्ग पहले से ही नफा नुकसान का आकलन करने में जुटा हुआ है। दूसरी तरफ अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि इस अतिरिक्त भुगतान के लिए सरकार के पास अतिरिक्त धन कहां से आयेगा। वर्तमान में जो आर्थिक स्थिति है, उसमें सरकार को जनता से मिलने वाले धन का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही गैर उत्पादक खर्च में चला जा रहा है। इससे विकास कार्य अत्यंत धीमे पड़ गये हैं क्योंकि उनके लिए सरकार के खाते में धन ही नहीं बचता।