नेपाल में जिस तरीके से नेताओँ और पत्रकारों की जनता ने बुरी गत बना दी, उसे से यह विचार पनपा कि भारत में कितने ऐसे नेता हैं जो हेलीकॉप्टर पर लटककर भाग सकते हैं। वहां के एक नेता को जनता की धुलाई से बचने के लिए नाला में भी जंप लगाते देखा गया। बेचारे नेता जनता का हाथ जोड़ते रह गये पर आलीशान बंगला जलकर खाक हो गया।
यह तो रही नेताओँ की बात पर सोशल मीडिया में यह भी दिखा कि भारतीय मीडिया का भी वहां क्या हुआ। गोदी मीडिया शब्द वहां भी प्रचलित हो गया है और इसकी चपेट में नेपाल के कई चैनल भी आ गये। इससे यह सवाल उठा कि कहीं भारत में अइसा ही हो गया तो कितने नेता भाग सकेंगे और यहां के घोषित गोदी मीडिया के लोगों का आखिर क्या हाल होगा।
नेपाल में नेताओं की संख्या कम थी तो सेना के संरक्षण में चल गये, जो पीछे रह गये, उनकी पिटाई का दृश्य जनता ने देखा। अब भारत में नेताओँ की संख्या अधिक है और जनसंख्या भी। इसलिए यह आनुपातिक गणित का सवाल है कि कितने नेताओँ के हिस्से में कितनी पिटाई तय है। इंडियन पब्लिक को जयप्रकाश नारायण का आंदोलन भी याद है जब युवाओं के दबाव में नेताओँ ने धड़ाधड़ इस्तीफा भी दे दिया था।
लेकिन असली सवाल गोदी मीडिया का है। वह बेचारे तो हेलीकॉप्टर पर लटककर भाग भी नहीं सकते और कौन किस दफ्तर में हैं, कहां रहता है, यह सारी जानकारी पब्लिक के पास पहले से है। अभी जनता कुछ नहीं कहती तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कल अगर माहौल बदल गया तो वे बच पायेंगे।
अभी जो मोदी जी का सुरक्षा छाता मौजूद है, वह हट गया तो किसकी क्या हालत होगी, यह सोचने वाली बात है। पता नहीं आप लोगों ने गौर किया है अथवा नहीं, एक मोदी समर्थक चैनल ने अब फेसबुक पर अपना रेडियो प्रसारण प्रारंभ कर दिया है, जिसमें अप्रत्याशित तौर पर विपक्ष के मुद्दों की चर्चा होती है और खास तौर पर राहुल गांधी का जिक्र होता है।
वरना इन चैनलों ने तो मानों विपक्ष की बातों को नहीं दिखाने की कसम खा रखी है। इस एक घटना से संकेत मिलता है कि एक टीवी चैनल समूह पहले से ही डाली बदलकर दूसरी डाली पकड़ने की तैयारियों में जुटा है। लेकिन जिनकी पीठ पर मोदी समर्थक होने का ठप्पा लग गया है, उनकी पीठ कितनी मजबूत है, यह असली सवाल है। इसी बात पर एक फिल्मी गीत याद आने लगा है.सुपरहिट फिल्म लावारिस के लिए इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था कल्याणजी आनंद जी ने। इसे किशोर कुमार ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ ऐसे हैं।
अपनी तो जैसे-तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे
कट जाएगी
आपका क्या होगा जनाब-ए-आली
आपका क्या होगा
अपने आगे ना पीछे, ना कोई ऊपर-नीचे
रोने वाला
ना कोई रोने वाली जनाब-ए-आली
आपका क्या होगा
आप भी मेरी तरह इन्सान की औलाद हैं
आप मुँह माँगी दुआ, हम अनसुनी फ़रियाद हैं
वो जिन्हें सारा ज़माना समझे लावारिस यहाँ
आप जैसे ज़ालिमों के ज़ुल्म की ही ईजाद हैं
गाली हज़ूर की तो, लगती दुआओं जैसी
हम दुआ भी दें तो लगे है गाली
आपका क्या होगा…
आपके माथे से छलके जो पसीना भी कहीं
आसमाँ हिलने लगे और काँप उट्ठे ये ज़मीं
आपका तो ये पसीना ख़ून से भी क़ीमती
और अपने ख़ून की क़ीमत यहाँ कुछ भी नहीं
अपना तो ख़ून पानी, जीना-मरना बेमानी
वक़्त की हर अदा है अपनी देखी-भाली
आपका क्या होगा…
ऐसे लोगों में फेसबुक पर सक्रिय रहने वाले चंद चेहरे भी शामिल हैं। इनमें से कुछ लोगों ने अब चालाकी से अपना चेहरा छिपाना प्रारंभ कर दिया है ताकि लोग उनकी पहचान तुरंत में तय नहीं कर पाये। अब तो हालत ऐसी हो गयी है कि आम जनता के बीच ऐसे लोगों का जाना भी दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है क्योंकि इंडियन मैंगो मैन की याददाश्त बड़ी मजबूत होती है।
लोग पुरानी बातों को याद दिलाते रहते हैं। मसलन आज तक हरेक के बैंक खाता में पंद्रह पंद्रह लाख रुपये और साल में दो करोड़ रोजगार की बात लोग भूलते नहीं है। इसलिए सवाल और महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि कहीं सत्ता बदल गयी तो मार्का मारे गये लोगों का आखिर क्या होगा। पता नहीं इनमें से कितने लोग विदेश भाग सकते हैं।
जो बच जाएंगे, उनकी सामाजिक स्थिति और नौकरी का क्या होगा, यह लाख टके की बात है। निंदक तो यह भी कहते हैं कि चंद पूंजीपतियों ने पहले से ही विदेश चले जाने का इंतजाम कर रखा है पर वे अपने साथ मीडिया के इन भक्तों को भी ले जाएंगे, इसकी बहुत कम संभावना है। इसलिए तो पूछता हूं कि आपका क्या होगा जनाब ए अली।