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कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेडा ने फिर से चुनाव आयोग को घेरा

पहले कहा शिकायत नहीं मिली तो गलत फॉर्मेट कैसे हुआ

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः हाल ही में बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सामने आई कथित विसंगतियों को लेकर कांग्रेस और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं। इस विवाद की शुरुआत कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के एक बयान से हुई, जिसमें उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची से नाम हटाने, त्रुटियों और विसंगतियों से जुड़ी लगभग 89 लाख शिकायतें दर्ज की गई थीं, जिन्हें चुनाव आयोग ने बिना किसी उचित जांच के खारिज कर दिया।

इसके जवाब में, चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत मिली ही नहीं। लेकिन इस दावे पर जल्द ही सवाल खड़े हो गए, जब चुनाव आयोग ने यह कहकर खुद को ही मुश्किल में डाल लिया कि प्राप्त शिकायतें गलत फॉर्मेट में थीं। यह बयान एक विरोधाभास पैदा करता है: यदि चुनाव आयोग को कोई शिकायत मिली ही नहीं, तो उन्हें कैसे पता चला कि शिकायतें गलत फॉर्मेट में थीं? यह सवाल ही इस पूरे मामले को संदिग्ध बना देता है और चुनाव आयोग के रुख पर संदेह पैदा करता है।

विवाद का एक और महत्वपूर्ण बिंदु शिकायतों की संख्या है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने सवाल उठाया कि मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख नामों की तुलना में 89 लाख शिकायतें कैसे हो सकती हैं। इस पर, बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता राजेश राठौर ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि शिकायतें केवल नाम हटाने तक ही सीमित नहीं थीं।

उन्होंने बताया कि इन शिकायतों में मतदाता सूची में मौजूद विसंगतियों, गलतियों और नए नाम जोड़ने से संबंधित मामले भी शामिल थे। कई मामलों में, एक ही मतदाता ने अलग-अलग कारणों से एक से अधिक शिकायतें दर्ज कराई होंगी, जिससे कुल शिकायतों की संख्या बढ़ गई।

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने यह भी बताया कि मतदाताओं की ओर से बूथ लेवल एजेंट्स द्वारा आपत्तियां दर्ज की गई थीं और उन्हें जिला चुनाव अधिकारियों को सौंपा गया था। खेड़ा ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कहा कि जब पार्टी के बीएलए ने शिकायतें दर्ज करने की कोशिश की, तो उन्हें यह कहकर रोक दिया गया कि शिकायतें केवल आम नागरिकों से स्वीकार की जाएंगी, न कि राजनीतिक दलों से।

इस बात पर भी विवाद है कि क्या सभी 89 लाख शिकायतें उचित फॉर्मेट, जैसे कि फॉर्म 6 (नए नाम जोड़ने के लिए), फॉर्म 7 (आपत्तियों या नाम हटाने के लिए) और फॉर्म 8 (संशोधन के लिए) में थीं। कांग्रेस प्रवक्ता राजेश राठौर ने यह तो स्वीकार किया कि वह इस बात की पुष्टि नहीं कर सकते कि सभी शिकायतें फॉर्म 6 के माध्यम से की गईं, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग प्रक्रिया की आड़ में इन अनियमितताओं को छिपाने की कोशिश कर रहा है।

कुल मिलाकर, यह मामला भारतीय चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है और यह दर्शाता है कि मतदाता सूची में त्रुटियों को लेकर राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच मतभेद हैं। इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि चुनावी प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता लाने के लिए दोनों पक्षों के बीच संवाद और सहयोग की आवश्यकता है।