Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Ujjain Road Accident: उज्जैन में भीषण सड़क हादसा; तेज रफ्तार कार ने 5 लोगों को रौंदा, एक महिला की मौ... Gwalior Crime: ग्वालियर में कांग्रेस पार्षद पर जानलेवा हमला; बदमाशों ने सरेराह मारी गोली, अस्पताल मे... सेना ने संदिग्ध विस्फोटक को किया निष्क्रिय नियमों को ताक पर रख दवा और उपकरणों की खरीद उच्च न्यायालय के नये निर्देश से पत्थर उद्योग पर संकट Shocking News: खुशियां मातम में बदलीं! 1 मई को गूंजी थी शहनाई, 3 मई को अर्थी देखकर फूट-फूटकर रोया पू... Jabalpur Bargi Dam: मसीहा बनकर आया 22 साल का रमजान; बरगी डैम हादसे में मौत के मुंह से ऐसे बचाई 7 जिं... फालता में दोबारा चुनाव अब 21 मई को भारत ने नये मिसाइल का परीक्षण कर लिया बीमा क्षेत्र में 100 फीसद एफडीआई को केंद्र की मंजूरी

अंततः अमेरिकी टैरिफ पर मुंह खुला

भारतीय आयातों पर अमेरिकी टैरिफ की समयसीमा दो दिन दूर है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ज़ोर देकर कहा कि उनकी सरकार किसानों और लघु उद्योगों के हितों से समझौता नहीं करेगी। उन्होंने आगाह किया कि हम पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन हम इसे सहन करेंगे। व्यापार समझौते में गतिरोध के बीच नई दिल्ली और वाशिंगटन के संबंध तनावपूर्ण हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ दोगुना करके 50 प्रतिशत कर दिया है, जिसमें भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक, भारत के पास 27 अगस्त तक विदेशों से अपनी मौजूदा तेल आपूर्ति के लगभग एक-तिहाई हिस्से की भरपाई के लिए विकल्प खोजने का समय है।

रूसी तेल खरीदने से भारत को आयात लागत पर अरबों डॉलर की बचत हुई, जिससे घरेलू ईंधन की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर रहीं। आपूर्तिकर्ता बदलने से कीमतों में वृद्धि का ख़तरा पैदा हो सकता है, लेकिन ऐसा न करने से भारत के निर्यात पर असर पड़ेगा। नई दिल्ली ने वाशिंगटन के इस कदम को अनुचित, अनुचित और अविवेकपूर्ण करार दिया है।

खुद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत किसी को जबरन तेल खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर रहा है। जिसे यह सौदा पसंद नहीं आये वह तेल नहीं खरीदे पर इसके नाम पर टैरिफ का बोझ डालना वैश्विक कूटनीति में नये किस्म का ब्लैकमेल जैसा ही है। आज दुनिया में हर कोई आर्थिक हितों के आधार पर राजनीति करने में व्यस्त है।

पीएम मोदी ने कहा, अहमदाबाद की इस धरती से, मैं अपने छोटे उद्यमियों, अपने छोटे दुकानदार भाइयों और बहनों, अपने किसान भाइयों और बहनों, अपने पशुपालक भाइयों और बहनों से कहूँगा और यह मैं गाँधी की धरती से कह रहा हूँ। मेरे देश के छोटे उद्यमी हों, किसान हों या पशुपालक, सबके लिए, मैं आपसे बार-बार वादा करता हूँ, मोदी के लिए आपका हित सर्वोपरि है, प्रधानमंत्री मोदी ने शहर में कई परियोजनाओं का शुभारंभ करने के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा।

उन्होंने कहा, मेरी सरकार छोटे उद्यमियों, किसानों और पशुपालकों को कभी कोई नुकसान नहीं होने देगी। चाहे कितना भी दबाव आए, हम उसका सामना करने की अपनी क्षमता बढ़ाते रहेंगे। प्रधानमंत्री ने स्वदेशी वस्तुओं के व्यापक उपयोग पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, हम सभी को केवल भारत में निर्मित सामान खरीदने के मंत्र का पालन करना चाहिए।

व्यापारियों को अपने प्रतिष्ठानों के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगाना चाहिए, जिस पर लिखा हो कि वे केवल स्वदेशी सामान बेचते हैं। 50 प्रतिशत अमेरिकी कर से रत्न और आभूषण से लेकर कपड़ा और समुद्री खाद्य तक, कम मार्जिन वाले, श्रम-प्रधान उद्योगों के चौपट होने का खतरा है। इस बयान से कृषि विशेषज्ञों को उनके द्वारा लाये गये तीन कृषि कानूनों की याद आ गयी।

जिन्हें काफी लंबे समय तक के आंदोलन के बाद अंततः वापस लेना पड़ा था पर आगे की कार्रवाई कुछ भी नहीं हुई। भारत में कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग कार्यरत हैं और यह व्यापार वार्ताओं में एक प्रमुख अड़चन रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि ट्रंप की धमकियाँ भारत के लिए सबसे बड़ी आशंकाएँ हैं।

उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि बिना किसी समझौते के, एक अनावश्यक व्यापार युद्ध छिड़ सकता है और कल्याण की हानि निश्चित है। लेकिन इन सभी के बीच ट्रंप और उनके सहयोगियों द्वारा बार बार पाकिस्तान के साथ युद्धविराम कराने के दावे पर उनकी चुप्पी देश को नागवार गुजर रही है। इधर उधर की बात कहने के अलावा वह सीधे सीधे देश को इस दावे की सच्चाई बता सकते हैं।

अगर ऐसा नहीं हुआ था तो लोकसभा में राहुल गांधी की चुनौती के जबाव में वह कह सकते थे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप झूठ बोल रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा कुछ नहीं कहा और अब तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी बैंस ने भी इसी दावे को दोहरा दिया है। स्पष्ट है कि डोनाल्ड ट्रंप को लेकर अहमदाबाद और बाद में अमेरिका में किया गया मोदी के प्रचार का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी अमेरिका ने जिस तरीके से पाकिस्तान का समर्थन किया है, वह कोई गोपनीय बात नहीं है। ऐसे में यह माना जा सकता है कि सिर्फ प्रदर्शनों और हवाबाजी की कार्रवाइयों के बीच भारत की विदेश नीति उल्टी दिशा में चली गयी है। गनीमत है कि भारत का पुराना मित्र रूस उसके साथ खड़ा है। लेकिन मोदी की अपील का वैश्विक कारोबार पर कितना असर होगा, यह समझने वाली बात है। देश और सत्ता को दरअसल इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम कूटनीति में फेल हुए हैं।