अब चूंकि काफी हद तक शांति है, इसलिए यह सवाल पूछा जा सकता है। वरना युद्ध की परिस्थिति में ऐसे सवाल आज के दौर में राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आ जाते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ऑनलाइन गलत सूचना और भ्रामक जानकारी का प्रसार हुआ, जिससे लोगों के लिए तथ्य और कल्पना में अंतर करना मुश्किल हो गया। कई मीडिया आउटलेट ने असत्यापित दावों से भरी सनसनीखेज कहानियाँ प्रकाशित कीं और फर्जी तस्वीरें और वीडियो प्रसारित किए।
अक्सर लोगों की प्रतिक्रिया कट्टरपंथ की वजह से होती थी। क्या संघर्ष के दौरान सच्चाई को स्थापित करना एक समस्या है?भारतीय मीडिया घरानों ने संघर्षों की कवरेज के लिए नियम नहीं बनाए हैं। यह विशेष रूप से दुखद है क्योंकि स्वतंत्र भारत में पाकिस्तान और चीन के साथ कई सैन्य संघर्ष हुए हैं।
हमारे पास आंतरिक संघर्ष भी रहे हैं – माओवादी विद्रोह, अलगाववादी आंदोलन और कश्मीर में उग्रवाद, जिसमें हिंसा की सीमा पार प्रकृति के कारण युद्ध के तत्व हैं। हमारे पास केवल पत्रकारिता के लिए बुनियादी नियम हैं – आपकी जिम्मेदारी जनता को सटीकता से सूचित करना, सरकार और विरोधी से अपनी जानकारी सत्यापित करना और कई स्रोतों से जानकारी एकत्र करना है।
ये सभी सत्य के जितना संभव हो उतना करीब पहुंचने के तरीके हैं। दूसरे शब्दों में, वस्तुनिष्ठ होने का यही मतलब है। बहुत से लोग वस्तुनिष्ठता को तटस्थता के समान ही समझते हैं। आप पक्ष ले सकते हैं और फिर भी वस्तुनिष्ठ रह सकते हैं, है न?
और ये सभी इसके लिए रास्ते हैं। फिर, ज़ाहिर है, अपने दर्शकों और पाठकों के प्रति प्रतिबद्धता कि आप गलत सूचना नहीं फैलाएँगे – कम से कम जानबूझकर तो नहीं। आपको प्रचार और वास्तविक (सूचना) के बीच का अंतर पता होना चाहिए।
संघर्ष के दौरान, राष्ट्रीय सुरक्षा का एक तत्व होता है – आपको सेना की आवाजाही के बारे में नहीं बताना चाहिए। दुर्भाग्य से गलत और फर्जी सूचना प्रसारित करने वाले किसी भी प्लेटफॉर्म ने अपनी गलती अथवा जानबूझकर की गयी साजिश के लिए देश से माफी नहीं मांगी है।
वरना सैन्य कार्रवाई के दौरान बहुत कुछ ऐसा बता दिया गया जिसके मुताबिक भारतीय सेना पाकिस्तान पार कर ईरान की सीमा तक पहुंच गयी थी। ऐसी गैरजिम्मेदाराना आचरण से देश को कितना नुकसान होता है, इस पर किसी ने सोचा भी नहीं।
यह भी सच है कि ऐसे अवसरों पर पत्रकार ऐसे साधन बन जाते हैं जिनके माध्यम से सरकार राष्ट्रीय मनोबल को बनाए रखना चाहती है।और वे बस जनता को सूचित करने की अपनी प्रतिबद्धता छोड़ देते हैं।
राष्ट्र के प्रति वफादारी की मांग सरकार द्वारा की जाती है। खतरा यह है कि यह सत्ता में बैठे लोगों के प्रति वफादारी भी बन सकती है। भले ही कुछ मात्रा में गलत सूचनाएं अनजाने में हो रही हों, लेकिन इनमें से अधिकांश कई स्तरों पर काफी रणनीतिबद्ध होती हैं।
संचार रणनीति इस बात पर भी निर्भर करती है कि किसे कथा निर्धारित करने की आवश्यकता है। पहले दिन (ऑपरेशन सिंदूर के) जब हमले हुए, हम सभी के जागने से पहले ही पाकिस्तान से लोगों के घायल होने और टूटी हुई इमारतों के वीडियो आ गए थे।
इसकी तुलना 2019 से करें जब बालाकोट हमले हुए थे। कुछ (भारत में) ने तब दावा किया था कि (एक पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक ने कहा था कि) हमलों में 300 आतंकवादी मारे गए थे (लेकिन उनकी टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया गया)।
तब एक भी घायल या मृत व्यक्ति की तस्वीर नहीं फैलाई गई थी। लेकिन इस बार, यह पाकिस्तान था जो पहले कथा-निर्माण की दौड़ में शामिल हो गया, क्योंकि यह पाकिस्तान ही था कई मुख्यधारा के मीडिया चैनलों ने कहा कि हमने कराची बंदरगाह पर हमला किया है या इस्लामाबाद तक पहुँच गए हैं।
फिर सोशल मीडिया ने यह कहकर इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू कर दिया कि हम कराची में बहुत अंदर तक पहुँच गए हैं। तीसरे दिन तक, भारतीय सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया के (कुछ हिस्सों) पर बहुत ज़्यादा गलत सूचनाएँ फैल गईं।
हमने टीवी स्टूडियो से युद्ध के बहुत सारे नाटकीय चित्रण देखे। इन दिनों पत्रकारों पर क्या दबाव है? दरअसल चैनलों ने पाया है कि इस्लाम और मुसलमानों को शैतान बताना अच्छी टीआरपी बटोरता है।
इसलिए पाकिस्तान के साथ सैन्य संघर्ष उनके लिए हलवे जैसा है। और भी दुखद बात रही कि परमाणु हथियारों पर पटाखों की तरह चर्चा होती है।
लोग यह नहीं समझते कि ये सामूहिक विनाश के हथियार हैं। वे इस संघर्ष को आसमान में किसी तरह के मनोरंजन के रूप में पेश कर रहे थे और लोग इसे देखकर खुश लग रहे थे क्योंकि उन्हें लगा कि इससे उन पर कोई असर नहीं पड़ा। भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है।