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चीन के कृत्रिम सूर्य का प्रयोग तापमान में सफल

सर्वाधिक तापमान को स्थिर करने की दिशा में सफलता

  • एक सौ पचास मिलियन डिग्री पर प्लाज्मा

  • रेडियोधर्मी कचड़ा होने का खतरा भी नहीं

  • ऊर्जा की समस्या को खत्म कर सकता है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः परमाणु संलयन को विज्ञान की दुनिया में ऊर्जा का पवित्र प्याला माना जाता है। जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में चीन के हेफ़ई स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ प्लाज्मा फिजिक्स के वैज्ञानिकों ने अपने टोकामक रिएक्टर में 150 मिलियन डिग्री सेल्सियस के तापमान पर प्लाज्मा को रिकॉर्ड समय तक स्थिर रखने में सफलता प्राप्त की है। यह तापमान असली सूर्य के केंद्र (लगभग 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस) से 10 गुना अधिक है।

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वर्तमान में दुनिया भर के परमाणु ऊर्जा संयंत्र विखंडन तकनीक पर काम करते हैं, जिसमें भारी परमाणुओं को तोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया में रेडियोधर्मी कचरा पैदा होता है जो हजारों सालों तक खतरनाक रहता है। इसके विपरीत, संलयन वही प्रक्रिया है जो सूर्य और तारों को चमकने की शक्ति देती है। इसमें हाइड्रोजन के आइसोटोप्स मिलकर हीलियम बनाते हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है।

इस तकनीक में कार्बन उत्सर्जन शून्य है और इसमें कोई दीर्घकालिक रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न नहीं होता। संलयन के लिए आवश्यक ड्यूटेरियम समुद्र के पानी से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। विखंडन के विपरीत, संलयन रिएक्टर में मेल्टडाउन का खतरा नहीं होता। यदि प्रक्रिया बाधित होती है, तो रिएक्टर बस ठंडा होकर बंद हो जाता है।

सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के बिना पृथ्वी पर संलयन करना बेहद कठिन है। इसके लिए अत्यधिक तापमान की आवश्यकता होती है ताकि परमाणु आपस में जुड़ सकें। इतने उच्च तापमान पर पदार्थ प्लाज्मा अवस्था में आ जाता है, जिसे किसी भी भौतिक बर्तन में नहीं रखा जा सकता क्योंकि वह सब कुछ पिघला देगा। चीन के वैज्ञानिकों ने शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके इस प्लाज्मा को हवा में तैरते हुए नियंत्रित किया है।

2026 की इस ताजा उपलब्धि ने यह सिद्ध कर दिया है कि हम प्रयोगशाला से निकलकर व्यावसायिक बिजली उत्पादन की ओर बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रगति इसी गति से जारी रही, तो 2035-2040 तक हम संलयन आधारित बिजली ग्रिड देख पाएंगे, जो पूरी दुनिया की ऊर्जा समस्या को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।

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