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होलिका दहन के लिए नई विधि का उपयोग करेंगे पहली बार

लकड़ी के बदले गौकाष्ठ का इस्तेमाल होगा

राष्ट्रीय खबर

जयपुर: पेड़ों की लकड़ी की जगह गोकाष्ठ का इस्तेमाल कर जयपुर शहर पर्यावरण के अनुकूल होलिका दहन की राह दिखा रहा है। इस साल जयपुर में 600 से ज्यादा जगहों पर गोकाष्ठ का इस्तेमाल कर होलिका दहन किया जाएगा। पिछले कुछ सालों में गोबर से बने गोकाष्ठ लकड़ी के अनूठे और टिकाऊ विकल्प के तौर पर उभरे हैं और पेड़ों को बचाने का काम कर रहे हैं।

यह पारंपरिक लकड़ी की तरह जलता है, लेकिन पर्यावरण के लिए ज्यादा अनुकूल है। इसे देखते हुए गोकाष्ठ का इस्तेमाल न सिर्फ होलिका दहन बल्कि अंतिम संस्कार, हवन, ईंधन आदि के लिए भी बढ़ रहा है। जयपुर में कई गोशालाएं (गौशालाएं) जिनमें गायों की अच्छी संख्या है, वे बड़ी मात्रा में गोकाष्ठ बना रही हैं। जयपुर की पिंजरापोल गोशाला में 3000 से ज्यादा गायें हैं और इस साल होलिका दहन के लिए शहर में 400 जगहों पर गोकाष्ठ की आपूर्ति की जा रही है।

पिंजरापोल गोशाला के गोकाष्ठ प्रकोष्ठ के प्रभारी राधेश्याम विजयवर्गीय ने बताया कि हम वर्षों से लोगों को होलिका दहन में गोकाष्ठ का उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, क्योंकि इससे न केवल पेड़ों की रक्षा हो रही है, बल्कि गोशालाओं को आर्थिक रूप से भी मजबूती मिल रही है। यह अच्छी बात है कि लोग अब होलिका दहन के अलावा अन्य कार्यों में भी इसका उपयोग करने के लिए आगे आ रहे हैं।

एक होलिका दहन में करीब 150 किलो गोकाष्ठ और उपले की जरूरत होती है, जिसकी कीमत करीब 2500-3000 रुपये होती है। इस तरह यह गोशालाओं के लिए आय का नया जरिया बन गया है, जो गायों और गोवंश को रखने के लिए ज्यादातर सरकारी फंडिंग और दान पर निर्भर हैं। गोशाला संचालकों ने बताया कि गोकाष्ठ एक जैविक ईंधन है, जिसे सूखे गोबर को मशीनों से दबाकर लकड़ियों में बदला जाता है।

यह लकड़ी जितना ही मजबूत होता है, जलने पर कम धुआं और कम कार्बन उत्सर्जित करता है। इसके उपयोग से प्रदूषण कम होता है और यह लकड़ी का किफायती विकल्प साबित हो रहा है। इससे वनों का संरक्षण हो रहा है और गौशालाओं में गोबर का उचित प्रबंधन भी संभव हो रहा है।