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आर्थिक असमानता की बढ़ती खाई देश के लिए चुनौती

देश में तेज आर्थिक विकास असंतुलित विकास, बढ़ती असमानता और विकास के चुनिंदा शहरी क्षेत्रों में सीमित रह जाने के रूप में सामने आया है। इसे साफ शब्दों में इस ढंग से समझा जा सकता है कि शहरों में सुविधाएं बढ़ रही है।

इसी वजह से गांवों से विस्थापन हो रहा है। शहरों के मुकाबले महानगरों  में अधिक उम्मीद है इसलिए लोग महानगरों की तरफ भाग रहे हैं। अब सामूहिक मुद्दों पर गौर करें तो चंद औद्योगिक घराने अमीर हो रहे हैं जबकि आम आदमी और गरीब होता जा रहा है।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट रिलेटिव इकनॉमिक परफॉर्मेंस ऑफ इंडियन स्टेट्स: 1960-61 टु 2023-24 में इस विषय की गहराई से पड़ताल की गई है। इसमें वृहद आर्थिक संदर्भों में तथा लोगों की खुशहाली के संदर्भ में राज्यों की प्रगति की सूक्ष्म समीक्षा करके अच्छा किया गया है।

यह देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में राज्यों की हिस्सेदारी और उनकी सापेक्षिक प्रति व्यक्ति आय पर केंद्रित है। दोनों ही मानकों पर बीते छह दशकों में पश्चिम और दक्षिण भारत ने देश के अन्य हिस्सों को पीछे छोड़ दिया है।

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना, इन पांच दक्षिण भारतीय राज्यों का देश की कुल जीडीपी में करीब 30 फीसदी योगदान है। महाराष्ट्र और गुजरात ने 1960 के दशक से ही वृद्धि और प्रति व्यक्ति आय में इजाफे में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है।

दोनों राज्यों की प्रति व्यक्ति आय 1960 के दशक से राष्ट्रीय औसत से अधिक है। वर्ष 2023-24 में गुजरात की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के 160.7 फीसदी और महाराष्ट्र की 150.7 फीसदी रही। ओडिशा, सिक्किम, हरियाणा और दक्षिण के राज्यों ने 1990 के दशक के बाद से काफी सुधार किया है।

बहरहाल इसी दौरान पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की प्रति व्यक्ति आय में 1960-61 के स्तर से गिरावट आई है और अब वे राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे हैं।

खासतौर पर पश्चिम बंगाल की आर्थिक हिस्सेदारी में गिरावट आई और 2023-24 में उसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का 83.7 फीसदी रह गई जबकि 1960-61 में यह तीसरा सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला देश था। उस समय इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 27.5 फीसदी अधिक थी।

बिहार की प्रति व्यक्ति आय न केवल 1960 के दशक से ही राष्ट्रीय औसत से कम है बल्कि 1960-61 में जहां यह राष्ट्रीय औसत की 70.3 फीसदी थी वहीं अब यह घटकर उसकी 32.8 फीसदी ही रह गई है।

क्षेत्रीय अंतर के अलावा पड़ोसी राज्यों की की तकदीर भी समय के साथ बदली है। 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद पंजाब और हरियाणा की आय के स्तर में तेज इजाफा हुआ, वहीं पंजाब इस गति को बरकरार नहीं रख सका और उसकी आर्थिक स्थिति हरियाणा की तुलना में कमजोर हो गई।

वर्ष 2023-24 में पंजाब की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत की 106.7 फीसदी हो गई जबकि 1960-61 में यह 119.6 फीसदी थी। दूसरी ओर, हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 2023-24 में 176.8 फीसदी रही।

यह 1960-61 के 106.9 फीसदी से बहुत अधिक थी। कुल मिलाकर अधोसंरचना, शहरीकरण की दरों, व्यापार और परिवहन की लागत तथा राज्यस्तरीय नीतिगत अंतर क्षेत्रीय आय और वृद्धि दरों में अंतर को कुछ हद तक स्पष्ट कर सकते हैं।

राज्यों के बीच बढ़ता अंतर अहम नीतिगत चुनौतियां पेश करता है। राज्यों के बीच राजकोषीय संसाधनों के वितरण को लेकर अलग किस्म का तनाव उत्पन्न हो रहा है।

अगर अमीर और गरीब राज्यों के बीच अंतर बढ़ा तो यह तनाव और अधिक बढ़ेगा। अब जरूरत इस बात की है कि लक्षित और केंद्रित हस्तक्षेप किया जाए ताकि पीछे छूट रहे राज्यों को तेजी से आगे लाया जा सके।

इसके लिए वित्त आयोग के फंड के बंटवारे समेत अन्य उपाय आजमाए जा सकते हैं। जरूरत इस बात की भी है कि राज्यों में मानव विकास को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाए ताकि अधिक संतुलित वृद्धि संबंधी अनुभव हो सकें।

इसमें से कोई काम आसान नहीं है लेकिन दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है। मोदी सरकार पर राजस्व के असमान बंटवारे का आरोप लगातार लगता आया है।

भाजपा शासित राज्यों को अधिक संसाधन देने तथा गैर भाजपा शासित राज्यों को कम देने का आरोप पुराना है। लेकिन इस बात को समझना होगा कि भारत अपने आप में एक पूरा शरीर है।

इसके किसी एक भाग को अधिक मजबूत बनाने के लिए अगर दूसरे अंगों को कमजोर किया जाए तो अंततः यह समग्र तौर पर नुकसन ही होगा।

इस सामान्य सी बात को समझते हुए हमें अपनी पुरानी अर्थव्यवस्था और गांव की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

इससे महानगरों और शहरों पर बढ़ रहे दबाव के साथ साथ प्रदूषण संबंधी समस्याओं का भी निवारण होगा, जो भारत के समग्र विकास के लिए जरूरी है।