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ना बोले ना बोले ना बोले .. .. .. ..

ना बोले तो दोहरा दिया पर भाई लोग हैं कि हाथ धोकर पीछे पड़े हैं। पहले तो सेबी को एडजस्ट किया था कि यह कह दे कि विदेशी शेल कंपनियों का पता नहीं लगाया जा सकता है। अब अचानक से यह चुनावी बॉंड का पेंच फंस गया। भारतीय स्टेट बैंक ने अपने तरीके से बता दिया है कि इतनी जल्दबाजी में इतना पेचिदा काम नहीं किया जा सकता है।

उसे उतना वक्त लगेगा जब तक कि लोकसभा चुनाव निपट नहीं जाते। लेकिन अपने भाई लोग हैं कि पहले से ही सारा गोला बारूद लेकर बैठे हुए थे। एक के बाद एक नये नये गोले दागे जा रहे हैं और भारतीय स्टेट बैंक में निदेशक बनाये गये भाजपा कार्यकर्ता की भी पहचान होने लगी है। बैंक भी बेचारा क्या करे। सारे शीर्ष अधिकारी तो एक्सटेंशन पर हैं, जरा सी चूं चपड़ की तो लेने के देने पड़ जाएंगे। कर्ज माफी का केस लादकर जेल भी भेजा जा सकता है।

पता नहीं माई लॉर्ड लोगों ने क्या सोचकर ऐसा फैसला ठीक लोकसभा चुनाव के पहले दे दिया। अब फैसला आ गया तो बबंडर तो होना ही था। डर लगता है यह सोचकर कि जो लोग सोच रहे हैं, अगर वह सच निकला तो आखिर क्या होगा। अब तो सेबी की आड़ में भी नहीं छिप सकते। किसी ने चुनावी बॉंड खरीदा होगा तो नाम पता दर्ज कराया होगा।

दूसरी तरफ किसी ने इसका धन हासिल किया होगा तो उसका भी ठौर ठिकाना स्पष्ट होगा। यह तो नहीं कह सकते कि कोई जानकारी नहीं है। अब सोलह हजार करोड़ में से कुछ माल अगर वाकई शेल कंपनियों का निकल आया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। जो छवि बनी है, वह तो एक झटक में समाप्त हो जाएगी। टेंशन तो इसी बात का है क्योंकि अब लोकसभा चुनाव बिल्कुल करीब आ चुका है। एक पार्टी बोल रही है कि नहीं बतायेंगे तो दूसरे डंडा लेकर पीछे पड़े हैं कि कैसे नहीं बताओगे।

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म आजाद का यह गीत याद आने लगा  है। इस गीत को लिखा था राजिंदर कृष्ण ने और संगीत में ढाला था सी रामचंद्र ने। इसे लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

घूँघट के पट ना खोले रे

राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

राधा की लाज भरी अँखियों के डोरे

देखोगे कैसे अब गोकुल के छोरे

देखो मोहन का मनवा डोले रे

राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

घूँघट के पट ना खोले रे

राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

याद करो जमुना किनारे, साँवरिया

याद करो जमुना किनारे, साँवरिया

ओढ़ी थी राधा की काहे गगरिया

इस कारन ना तुम संग बोले रे

राधा ना बोले, ना बोले रे

ना बोले, ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

घूँघट के पट ना खोले रे

राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

रूठी हुई यूँ ना मानेगी छलिया

चरणों में राधा के, रख दो मुरलिया

चरणों में राधा के, रख दो मुरलिया

बात बन जायेगी हौले हौले रे

राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

घूँघट के पट ना खोले रे

राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे

अब माई लॉर्ड लोगों के इजलास में इस पर क्या होगा, इस पर पूरे देश का ध्यान है। इसी तरह ईडी के मामलों पर भी अब लोगों का ध्यान जाने लगा है क्योंकि कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार का मामला खत्म होने के बाद स्वाभाविक रुप से ईडी के मामलों की कानूनी बैधता पर लोग सवाल पूछने लगे हैं। परेशानी सिर्फ कर्नाटक में ही नहीं है तमिलनाडू पुलिस ने तो ईडी के एक अफसर को घूस लेते रंगे हाथ गिरफ्तार कर मामला ही उलट दिया है। ऊपर से दिल्ली के तीन कद्दावर नेता जेल में बंद हैं और उनके खिलाफ सबूत क्या है, यह सवाल जनता के बीच उभर गया है। खुद राज्यसभा सांसद ने कोर्ट जाते वक्त चिल्लाकर यह कह दिया कि सरकारी गवाह का ऑडियो ही गायब कर दिया गया है। आज नहीं तो कल यह सवाल कोर्ट नहीं जनता की अदालत में भी पूछा जाएगा। ऊपर से दिव्यांग प्रोफसर साईबाबा के रिहा होने के बाद फादर स्टेन स्वामी की मौत का सवाल भी सर पर मंडरा रहा है।

टेंशन इस बात को लेकर भी है कि साहब ने तो आगे बढ़कर अबकी बार चार सौ पार का नारा दे दिया है। अब चिंता इस बात को लेकर है कि यह चार सौ पार आखिर होगा कैसे। यूपी, बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में सीटें अगर कम हो गयी तो उसकी भरपाई कहां से होगी। गुजरात, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान में तो ई वेकेंसी नहीं के बराबर है।