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भारत के लिए श्रम बल में आती चुनौती

विकसित देशों में श्रमिकों की भारी कमी के बीच खेती, निर्माण और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करने के वास्ते भारतीय कामगारों को विदेश भेजने के लिए विकसित देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते करने का भारत सरकार का इरादा है। अभी बड़ी जोर शोर से हरियाणा और गुजरात से विदेश में कामगार भेजने का प्रचार किया गया था।

निरंतर बढ़ती आबादी के बीच भारत को अभी से इस पर विचार करने की जरूरत है। वरना यह स्थिति भी हो सकती है कि देश में रोजगार में कमी की वजह से सबसे अधिक आबादी वाले देश में काम करने के लिए योग्य युवा ही ना रहें। अब तो इस बात की भी जानकारी आयी है कि यूनान ने भारत से संपर्क किया है कि वह कृषि क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 10,000 कामगारों को उसके यहां भेजे।

इटली भी अपने विभिन्न शहरों के नगर निकायों में काम करने के लिए लोगों की तलाश में है। भारत पहले ही 40,000 से अधिक श्रमिकों को इजरायल भेजने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है। यब बता दें कि हमास के साथ युद्ध शुरू होने से पहले इजरायल में लगभग 18,000 भारतीय श्रमिक काम कर रहे थे जो मुख्यतौर पर मरीजों की देखभाल के काम से जुड़े थे।

हालांकि, वहां युद्ध जारी है, ऐसे में इजरायल पहले से काम करने वाले लगभग 90,000 फिलिस्तीनियों की जगह दूसरी जगहों के कामगारों की भर्ती करना चाहता है। सरकार की इस पहल का स्वागत कई कारणों से अवश्य किया जाना चाहिए। भारत में कुशल और मेहनती कामगारों की तादाद बहुत ज्यादा है।

कई वर्षों से संगठित और अनौपचारिक तरीके से ये कामगार कई देशों में जाते रहे हैं और इसका अंदाजा विदेश से भारत भेजी जाने वाली राशि से मिलता है। भारत भी अपने व्यापारिक साझेदार देशों के साथ किए जाने वाले विभिन्न समझौतों में भी कामगारों की आवाजाही की वकालत करता रहा है। लेकिन अपने देश का क्या होगा, यह सवाल भी परदे के पीछे से उभर रहा है।

विकसित देशों की समस्या यह है कि इनकी आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में उन्हें काम कराने के लिए बाहर के श्रमिकों की जरूरत बढ़ने लगी है। भारत के लिए यह एक सुनहरा मौका है क्योंकि भारत कामगारों की कमी की भरपाई करने में सक्षम हो सकता है। हालांकि कामगारों को विदेश भेजने पर एक चिंता जरूर हो सकती है कि इससे देश में कहीं श्रमिकों की कमी न हो जाए लेकिन फिलहाल विकसित देशों की मांग अस्थायी ही लग रही है।

कामगारों के विदेश जाने का एक फायदा यह है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के तजुर्बे के साथ देश वापस आएंगे। विकसित देशों में मजदूरी की दर ज्यादा है, ऐसे में वे अपने बचत के पैसों से भारत में घर या जमीन जैसी संपत्ति में निवेश कर सकते हैं। यह भी संभव है कि कुछ लोग वहीं बसना चाहेंगे। इससे पहले भी रोजगार की चाह में जो भारतीय विदेश गये थे, उनमें से अनेक वहां बस गये।

इसलिए कुशल श्रमिक का भारत में नहीं होना एक गैर अनुमानित खतरा भी है। इस संदर्भ में भी भारत को हर हाल में अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों को कौशल परीक्षण देने और इसका बेहतर माहौल बनाने की जरूरत है। विदेश में श्रमिकों को भेजने की पहल अच्छी है लेकिन नीतिगत नजरिये से भी यह समझना जरूरी है कि इससे भारत की बेरोजगारी या कम रोजगार की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।

यह एक तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था की अच्छे वेतन वाली पर्याप्त नौकरियां सृजित न कर पाने की कमजोरी का हल भी नहीं है। ताजा वार्षिक आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण के अनुसार, कुल श्रमबल के 57 फीसदी लोग से अधिक स्व-रोजगार से जुड़े हैं। इसे उद्यमशीलता का सूचक नहीं माना जा सकता है क्योंकि ये ऐसे लोग हैं जो अपनी आजीविका के लिए किसी तरह की आर्थिक गतिविधि से जुड़ जाते हैं क्योंकि कोई काम न करने का विकल्प उनके पास नहीं है।

भारत के कुल कामगारों में से 18 फीसदी से ज्यादा अपने छोटे-मोटे घरेलू कारोबार में ही सहयोगी के तौर पर लगे हुए हैं जबकि 21 फीसदी से ज्यादा खुद को अस्थायी मजदूर मानते हैं। इस तरह से इन लोगों को लगातार बेरोजगारी की समस्या से जूझना पड़ता है। अमीर देशों में श्रमिकों को भेजने से भारत की बेरोजगारी और कम रोजगार की समस्या का हल नहीं होगा।

सरकार कामगारों को विदेश भेजने की पहल में काफी सक्रिय दिख रही है। लेकिन पेरिस के पास एक विमान को रोके जाने और मानव तस्करी का पता लगने पर भी ध्यान देने की जरूरत है। आखिर लोग किसी कीमत पर अगर विदेश जा रहे हैं तो उसकी एकमात्र वजह देश में रोजगार की कमी है। इस कमी को दूर करने के लिए नाली के गैस से चाय बनाना कोई विकल्प नहीं हो सकता, इसे स्वीकार करना होगा।