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कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो

कुछ तो कहो का सवाल जिसके लिए प्रासंगिक है, वह चुप है और जिन्हें नहीं बोलना चाहिए था, वह बोलकर अपने लिए परेशानी मोल ले रहे हैं। बिना चाहे बोलने वालों की कतार अब लंबी होती जा रही है। मेरे पास एक्जाम्पल है ढेर सारे। हाल की बात करें तो सबसे पहले राहुल गांधी ने पैदल चलते हुए बोलना शुरू किया।

ज्यादा बोल गये तो क्या नतीजा निकला। मेंबरी चली गयी और आज बंगला भी खाली करना पड़ गया। संजय राउत बहुत ज्यादा बोलते थे तो जेल के अंदर रहे तो होश ठिकाने आ गये। ममता बनर्जी बोलती थीं तो ईडी और सीबीआई के धक्के से बेहाल हो रही हैं। सत्यपाल मलिक कुछ ज्यादा ही बोल गये तो अब सीबीआई उनके पूछताछ करने जाएगी।

वैसे कंफ्यूजन यह है कि सत्यपाल मलिक ने नया कुछ तो नहीं कहा है। वह जो कई साल पहले भी यह बातें कह चुके थे और तब से लोगों को पता था कि उनके मिलने गये नेता दरअसल राम माधव ही थे, जो उस वक्त मोदी की किचन कैबिनेट के प्रमुख सदस्य हुआ करते थे। अब हैं कि नहीं, यह पता नहीं क्योंकि वह बाद में पर्दे से हट गये अथवा हटा दिये गये।

अब देखिये लालू जी को। बहुत ज्यादा बोलते थे तो लगातार जेल में रहने की वजह से तबियत ही बिगड़ गयी। दूसरी तरफ उनके पुराने साथी नीतीश कुमार को देखिये, वह बोलते कुछ भी नहीं हैं पर अंदर ही अंदर खेल कर जाते हैं।

इसी वजह से यह कहावत बार बार दोहराया जाता है कि नीतीश बाबू के पेट में दांत है। इसलिए वह जब चबाते हैं तो किसी को नजर भी नहीं आता है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और उनके साथी ज्यादा बोलते थे तो क्या हाल हो गया है, सभी देख रहे हैं। वइसे इस नई राष्ट्रीय पार्टी के हाव भाव पुरानी पार्टियों के जैसे नजर तो नहीं आ रहे हैं।

लगातार सर फुटौव्वल करने को तैयार बैठे हैं सारे। मोदी की डिग्री की बात आयी तो सभी अपनी अपनी डिग्री दिखाने का अभियान चला रहे हैं। दूसरी तरफ अपने शरद पवार हैं जो कभी कभार बोलते हैं पर काम चुप चाप ज्यादा करते हैं। अब शरद पवार क्या खेल करने वाले हैं, यह समझना टेढ़ी खीर है। इसी बात पर एक फिल्म तेरे बिना का एक गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था सप्तर्षी ने और संगीत में ढाला था राजेश जौहरी ने। इसे अभिजीत भट्टाचार्य ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

कुछ तो कहो, ऐसे चुप ना रहो कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो
हो कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो
दिल की उदासी तोड़ो ज़रा सी कुछ कहो
चुप ना रहो कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो
हो कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो
दिल की उदासी तोड़ो ज़रा सी कुछ कहो

ख़्वाबों की ज़मीन पे
हम तो खड़े हैं आ के थाम लो
ख़्वाबों की ज़मीन पे
हम तो खड़े हैं आ के थाम लो
छोड़ो भी यह आँसू हंस के दिखाओ
दिल से काम लो

आँखें हिरन सी किस लिए भीगी बोलो साथिया
हो आँखें हिरन सी किस लिए भीगी बोलो साथिया
दिल की उदासी तोड़ो ज़रा सी कुछ कहो

चुप ना रहो

मैंने तुम्हे छु के इतना ही जाना
खुद मैं खो गया
मैंने तुम्हे छु के इतना ही जाना
खुद मैं खो गया
कितना नशा था किसको बताऊँ
क्या ये हो गया
हुवा नहीं ऐसा ये राज़ कैसा बोलो साथिया
हो हुवा नहीं ऐसा ये राज़ कैसा बोलो साथिया
दिल की उदासी तोड़ो ज़रा सी कुछ कहो

कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो
हो कुछ तो कहो ऐसे चुप ना रहो
दिल की उदासी तोड़ो ज़रा सी कुछ कहो
चुप ना रहो

अब झारखंड की भी चर्चा कर लें तो पूर्व राज्यपाल कुछ ज्यादा बोलने लगे थे इसलिए ट्रांसफर हो गया। नये राज्यपाल अभी तो कम बोल रहे हैं और शायद उनके बता कर भेजा गया है कि क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है। वरना पहले वाले लाटसाहब के जैसे चिट्ठी का लिफाफा चिपक जाने की बात कहकर सरकार को इतना नाराज नहीं कर लेते क्या।

नहीं बोलने वालों में नवीन पटनायक और जगन रेड्डी को देखिये। उन्हें सिर्फ अपने काम से मतलब है। दोनों ही राजनीतिक खेमाबंदी से दूर रहकर अपने राज्य का हित देखते हैं। लेकिन मल्लिकार्जुन खडगे और पवन खेडा का क्या करें। दोनों ज्यादा बोलते हैं और जब बोलते हैं तो परेशानी पैदा कर रहे हैं। अब देखिये किसे पता था कि ईवीएम के वीवीपैट में खराबी है। राज खुला तो अब नई बहस चालू हो गयी है। मजबूरी में चुनाव आयोग को सफाई देनी पड़ गयी। अब सुप्रीम कोर्ट को देखिये, वह भी कम बोलता है पर जब फैसले के तौर पर बोलता है तो केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ जाती है।