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हिंदी पट्टी में भाजपा को रोकने की नीतीश पहल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे से भेंट की है। इस मुलाकात में राहुल गांधी को भी आमंत्रित किया गया था। दूसरी तरफ नीतीश के साथ उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी शामिल थे। स्पष्ट है कि बिहार के जमीन पर जातिगत समीकरणों को साधते हुए भाजपा को रोकने का काम आगे बढ़ाया गया है।

वरना इससे पहले कई क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को हर बार की तरह बड़ा पार्टनर मानने तक से इंकार कर दिया था। इसके बाद विपक्षी एकता की गाड़ी ठहर सी गई थी, जो अब नीतीश की पहल पर दोबारा चल पड़ी है। इस मुलाकात की भाजपा की तरफ से प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक था। भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने राहुल गांधी को बधाई देते हुए नीतीश कुमार की एक तस्वीर साझा की और लिखा: और न जाने किस के सामने झुकेंगे नीतीश कुमार।

भाजपा की खुशबू सुंदर ने समूह को बेकार जमात कहा, और यह भी कहा कि इसने महाभारत के कौरवों की याद दिला दी। शिमला में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने गठबंधन को उन दलों का ठगबंधन बताया जो गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। भाजपा की तरफ से ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी।

लेकिन नीतीश कुमार की पहल के दूरगामी परिणाम को पिछले लोकसभा चुनाव के  वोट प्रतिशत से समझा जा सकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 37.37 प्रतिशत वोट मिले थे, जो साल 1989 के बाद उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इसकी बदौलत पार्टी ने 303 सीटों पर जीत दर्ज की थी। एनडीए को 353 सीटें मिली थी, जिनमें जेडीयू और अकाली दल भी शामिल थे। कांग्रेस को मात्र 52 सीटें मिली थी जबकि यूपीए को 91 सीटें मिली थी।

देश की अन्य पार्टियों को 98 सीटें मिली थी। इसलिए नीतीश कुमार की इस पहल का अगर कोई सार्थक परिणाम निकला तो यह जाहिर तौर पर भाजपा के लिए कठिन चुनौती वाली स्थिति होगी। इसके बीच ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बार बार यह दावा ठोंक रहे हैं कि इस बार भी भाजपा तीन सौ से अधिक सीटें जीतेगी और नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनेंगे।

नीतीश कुमार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कल ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी भेंट कर ली है। उनके साथ उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से मुलाकात की, जिससे अगले साल होने वाले राष्ट्रीय चुनाव में भाजपा को हराने के लिए विपक्षी दलों के एक साथ आने की अटकलों को और बल मिला।

केजरीवाल ने कुमार से मुलाकात के बाद संवाददाताओं से कहा, नीतीश जी ने सभी विपक्षी दलों को एक छत के नीचे इकट्ठा करने की अच्छी पहल की है। हम इसके साथ हैं और जिस तरह से यह बढ़ रहा है। केजरीवाल ने भी कहा कि देश बहुत कठिन समय से गुजर रहा है। मैंने कई बार कहा है कि आजादी के बाद से आज देश में शायद सबसे भ्रष्ट सरकार है।

भाजपा के साथ, अक्सर केंद्र पर उपराज्यपाल के माध्यम से दिल्ली की प्रगति को पटरी से उतारने की कोशिश करने का आरोप लगाती है। श्री केजरीवाल की बैठक श्री कुमार और श्री यादव द्वारा कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे और पार्टी नेता राहुल गांधी के साथ बातचीत के घंटों बाद हुई है।

यह 2024 के चुनाव के लिए विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए कांग्रेस और जनता दल (यूनाइटेड), या जद (यू) के शीर्ष नेताओं की पहली औपचारिक बैठक थी। हमने यहां एक ऐतिहासिक बैठक की। बहुत सारे मुद्दों पर चर्चा की गई और हमने फैसला किया कि हम सभी दलों को एकजुट करेंगे और आगामी चुनाव एकजुट तरीके से लड़ेंगे।

हमने यह फैसला किया है और हम सभी इसके लिए काम करेंगे। इस प्रारंभिक बैठक में यह तय हो गया है कि नीतीश कुमार अन्य दलों के साथ किस तरीके से संपर्क करेंगे। शेष के साथ संवाद की जिम्मेदारी कांग्रेस की है। खडगे के साथ हुई बैठक में राहुल का होना इस बात के संकेत है कि कांग्रेस की तरफ से दो किस्म की बातें नहीं निकले।

वरना इससे पहले राहुल गांधी ने सावरकर का नाम लेकर महाराष्ट्र में अपने सहयोगी दलों को नाराज कर लिया था। जातिगत समीकरणों से मतदान का मिजाज तय होने वाले राज्यों में भाजपा के हिंदू कार्ड का उत्तर तो जातिगत गोलबंदी ही दे सकती है, यह कई बार उत्तरप्रदेश और बिहार में प्रमाणित हो चुका है।

इसलिए हिंदी पट्टी में अगर यह दांव कारगर हो गया तो भाजपा को जीत के राह में सबसे अधिक रोड़े इन्हीं दो राज्यों में होंगे, इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा। शेष राज्यों में अगर क्षेत्रीय दलों के साथ वोटों के विभाजन को रोकने में कांग्रेस कामयाब हुई तो यह काम असंभव नहीं है, यह बात हर कोई जानता है। इसलिए माना जा सकता है कि भाजपा के चाणक्य के सामने अब बिहार का वह नेता खड़ा हो गया है, जिनकी चालों को समझना कठिन है।