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कठिन होती मोदी और शाह की राहें

वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के आने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की राहें कठिन होती चली जा रही हैं। दरअसल इससे पहले ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियों की कल्पना नहीं की गयी थी। माहौल तो किसान आंदोलन के समय से ही बदलना प्रारंभ हो गया था।

उसके बाद राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने देश को नये तरीके से सोचने का एक विकल्प दिया। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट और उस पर राहुल गांधी के सवालों ने जो बवंडर पैदा किया, वह अब तक मौजूद है। इसमें आम जनता के लिए जो सबसे प्रासंगिक सवाल है, वह यह है कि आखिर अडाणी समूह को इतना अधिक लाभ श्री मोदी के कार्यकाल में कैसे हुआ।

तरक्की के इस फार्मूले और अब विदेश में बनायी गयी फर्जी कंपनियों से भारत में पैसा आने का मुद्दा फंस रहा है। नई परेशानी यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने विरोधी दलों द्वारा दायर उस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकृत कर लिया है, जिसमें केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग की बात कही गयी है।

इससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग पर अपनी राय दे चुका है और ईडी के निदेशक को बार बार मिलने वाले सेवाविस्तार के मामले की सुनवाई कर रही है। कांग्रेस और 13 अन्य पार्टियों ने संयुक्त रूप से एनडीए सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सिर्फ राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग कर रही है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसका खास अनुरोध किया था। सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्काल सुनवाई के लिए इसे सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। इस याचिका में सिंघवी ने कहा कि लोकतंत्र देश के मूल ढांचे का हिस्सा है। संविधान और कोई नहीं, कम से कम सभी जांच एजेंसियां तो हो ही नहीं सकतीं।

इस याचिका में कांग्रेस के अलावा डीएमके, राजद, बीआरएस, टीएमसी, आप, एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के अलावा झामुमो, जदयू, माकपा, भाकपा, सपा और जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस पार्टी हैं। यह कदम विपक्ष के नेताओं के खिलाफ पिछले तीन वर्षों में जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई के बाद उठाया गया है।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ताओं ने माना कि 2004-14 के बीच यूपीए सरकार के कार्यकाल में 72 में से 43 में सीबीआई द्वारा राजनीतिक नेताओं की जांच की गई, और उनमें से, या 60%, विपक्षी दलों से थे। हालाँकि, उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के तहत 95 फीसदी मामलों की जांच विपक्ष के आंकड़ों से होती है।

विपक्षी राजनीतिक दलों ने कहा कि पुलिस, सीबीआई और ईडी को ट्रिपल टेस्ट – उड़ान जोखिम, उचित का पालन करना चाहिए। याचिकाकर्ता पक्षों ने यह भी कहा कि निचली अदालतों को नियम के रूप में जमानत, जेल एक अपवाद सिद्धांत का पालन करना चाहिए और रिमांड की खुली छूट नहीं होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता इन दिशानिर्देशों को पूरा करने और गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी को महसूस करने के लिए चाहते हैं। अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) सभी नागरिकों के लिए, जिनमें राजनीतिक असहमति के अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिए लक्षित लोग भी शामिल हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई स्वीकृत होने के बाद स्पष्ट है कि प्रथमदृष्टया शीर्ष अदालत भी मानता है कि इस याचिका में संवैधानिक दावा मजबूत है।

इसी वजह से उसे सुनवाई के लिए स्वीकृत किया गया है। पहले से सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार के प्रति जो रवैया रहा है, उससे कमसे कम यह संकेत तो मिल ही जाता है कि न्याय और संविधान की कसौटी पर बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो सुप्रीम कोर्ट को न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता है।

ऊपर से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बार बार आलोचना कर केंद्रीय कानून मंत्री किरेण रिजिजू ने भी शीर्ष अदालत को पहले से ही नाराज कर रखा है। केंद्र सरकार द्वारा जजों की प्रोन्नति को अपने हाथ में लेने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट अपने कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप मानता है। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान में वर्षित मूल सिद्धांतों के आधार पर अब कभी भी केंद्र सरकार के किसी फैसले पर सवाल उठा सकती है।

ऊपर से उप राष्ट्रपति ने यह कहकर सुप्रीम कोर्ट को भड़का दिया है कि दरअसल देश में कानून बनाने की शीर्ष अधिकार संसद के पास ही है। अभी राहुल गांधी के खिलाफ सूरत की अदालत का फैसला इस पूरे प्रकरण में आग में घी डालने का काम कर गया है। दरअसल मानहानि की दोनों धाराओँ यानी 499 और 500 में जो वर्णित तथ्य है, उन तथ्यों की कसौटी पर यह मामला ऊपर की अदालत में टिक पायेगा या नहीं, इस पर विधि विशेषज्ञों के बीच भी मतभेद है। फिर भी 2024 का लोकसभा चुनाव आने से पहले इस किस्म की गोलबंदी निश्चित तौर पर सरकार चलाने वाली जोड़ी यानी मोदी और शाह को परेशानी करने वाली साबित होने जा रही है।